जी डी अग्रवाल ने सरकार को सर्वमान्य गंगा कानून के लिये 10 अक्टूबर तक समय दिया

यदि तब तक सरकार नहीं मानी तो जल भी त्यागने का किया ऐलान

कार्यालय संवाददाता

नई दिल्ली: पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. जी डी अग्रवाल ने गंगा नदी को विशिष्ट मान्यता दिलाने के मकसद से कानून बनाकर इसे वैधानिक दर्जा देने के लिए केन्द्र सरकार को 10 अक्तूबर तक का समय दिया है। यह जानकारी जल पुरुष राजेन्द्र सिंह ने शनिवार को दी।

सिंह ने बताया कि इन्ही सब मसलों को लेकर प्रोफेसर जी डी अग्रवाल सिर्फ निम्बू, गंगा जल और शहद का सेवन कर 22 जून से गंगा तपस्या कर रहे हैं। हालांकि गिरती सेहत की वजह से बीच मे दो बार उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था और पिछली बार तो ड्रिप भी चढ़ाना पड़ा था। अब यदि सरकार ने उनकी मांग जल्दी पूरी नहीं की तो १० अक्टूबर से वे गंगा जल भी ग्रहण करना छोड़ देंगे।

“गंगा के लिए तपस्या करते हुए गंगा पुत्र का हमारे बीच से जाना हमारे लिए बड़ी दुर्घटना होगी इसलिए समय रहते इस पूरी तपस्या को प्रधानमंत्री जी संज्ञान में लेकर समाधान ढूंढे,” सिंह ने कहा।

उन्होंने बताया कि इसके लिए 16-18 सितम्बर तक दिल्ली में गंगा एवं गंगा पुत्र रक्षा संवाद स्थापित करने हेतु एक सम्मेलन की तैयारी की है जिससे समाज और सरकार मिलकर गंगाजी और गंगाजी के बेटों की जान बचा सके। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित इस सम्मेलन में देश भर के गंगा भक्त गंगा नदी के लिए चल रही कानून बनाने की प्रक्रिया और प्रस्तुत प्रारूपों पर चर्चा करेंगे. गंगा जी के विविध पक्षों पर भारत सरकार का ध्यान जाए, इस हेतु मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों एवं राजनीतिक दलों को भी इस सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है। आयोजकों के अनुसार सम्मेलन के अंत में 18 सितंबर को भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास व गंगा पुनर्जीवन मंत्री नितिन गडकरी भी शामिल होंगे।

कार्यक्रम के बारे बताते हुए जल जन जोड़ो अभियान के संयोजक संजय सिंह ने बताया कि सम्मेलन में इन तीन दिनों में सरकार द्वारा बनाए गये गंगा के प्रारूप बिल 2017 एवम उसके पूर्व बने प्रारूप बिल 2012 पर चर्चा होगी। इसमें खास तौर से प्रो. जी डी अग्रवाल की तरफ से गंगा के इन प्रारूपों पर स्वीकार व अस्वीकार पर बात होगी। इसमें प्रो अग्रवाल के हरिद्वार स्थित मातृ सदन से स्वामी शिवानंद सरस्वती, सीपीसीबी के पूर्व अध्यक्ष परितोष त्यागी, पर्यावरण विद एमसी मेहता समेत देश भर के गंगा प्रेमी मौजूद रहेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जलपुरुष राजेंद्र सिंह करेंगे।

सम्मेलन में प्रो अग्रवाल के इस बात पर गौर किया जाएगा कि गंगा भक्तो,वैज्ञानिको एवं कानूनविदों ने मिलकर 2012 में न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय की अध्यक्षता में जो प्रारूप तैयार किया था, वह गंगा को माई मानकर तथा भारत की संस्कृति और नित्य जीवन में पवित्र गंगा जी की विशिष्टता और अप्रतिम स्थान सुस्थापित कर किया गया था। गंगा की पवित्रतम धारा में करोड़ो नागरिको की आस्था को इस प्रारूप में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48(a), 49, 51 (a) से बल मिला था।

2012 एवं 2017 के दोनों प्रारूपों के उद्देश्यों में मूल अंतर है। सिंह ने कहा कि 2017 वाला प्रारूप गंगा माई से कमाई के रास्ते खोलता है, क्योकि इसमें गंगा के पूरे बेसिन को पुनर्जीवित करने के लिए मेगा प्रोजेक्ट प्रारम्भ कर के गंगा के नाम पर दुनिया भर से आर्थिक सहायता जुटाई जा सकती है। उन्होंने कहा यह प्रो अव्वल को मान्य नहीं है क्योंकि “आज हमारी गंगा माई को विशिष्ट दर्जा देने की जरुरत है न कि इससे विशिष्ट कमाई की जाए”।

सिंह ने बताया कि वर्ष 2017 में गिरधर मालवीय की अध्यक्षता में बनी सरकारी समिति ने अपने प्रारूप का उद्देश्य ही बदल दिया है। दोनों प्रारूपों में संवैधानिक भिन्नताए हैं जैसे की 2012 में संविधान के अनुच्छेद 51(a) का प्रावधान दिया गया है परन्तु 2017 में 51(a) के स्थान पर 51A(f) पर सीमित कर दिया गया है। इस प्रस्तावना की प्रस्तुति की भाषा में भी काफी फेरबदल की गयी है, और राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण को महज एक समिति में समेट दिया गया है। इसके प्रस्तावना के प्रारूप को भी कमज़ोर किया गया है जिस वजह से प्रावधान अस्पष्ट और विरोधाभासी हैं। अब इस वजह से सरकार को अपनी चहेती एजेंसियो को शक्तिशाली बना कर अवांछित फायदा उठाने का मौका मिलेगा। “इसलिए यह सरकारी प्रारूप प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को स्वीकार नहीं है और वे 2012 के बिल के प्रारूप को संसद द्वारा पारित कराने पर बल दे रहे हैं,” सिंह ने कहा।

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