गरीबों को नहीं मिल रहा है पुनर्वास

बिहार में विकास की कहानी का एक बड़ा सच यह है कि सरकार और प्रशासन की तरफ से जो दावे किए जाते हैं, धरातल पर वे दिखाई नहीं देते. इसकी गवाही भागलपुर जिले के वे महादलित परिवार देंगे जो वर्षों से अपने पुनर्वास की राह देख रहे हैं.

भागलपुर शहर के पुलिस लाइन रोड के किनारे बैठ कर रोज़गार का साधन जुटाने वाले स्थानीय निवासी उमेश दास कहते हैं: “मैं पेशे से मोची हूं और यहीं फुटपाथ पर दुकान लगाता हूं लेकिन उससे इतना भी नहीं कमा पाता कि परिवार को दो वक़्त का खाना खिला सकूं.”

उमेश दास ने बताया: “हमारे पास रहने के लिए घर भी नहीं है. बच्चों को पैसे के अभाव में नहीं पढ़ा पा रहे हैं. जहां रहते हैं वह सरकारी जमीन है. वहां से हटाने के लिए सरकार ने नोटिस भी भेज दिया है. अब हम कहां जाएंगे कहां रहेंगे.”

उन्होंने कहा: “सरकार हमें उस जगह से हटाना चाहती है तो हटा दे किन्तु हम लोगों को कहीं घर दे जहां हम रह सकें.”

उमेश ने आगे कहा कि सरकार की तरफ से हमेशा कहा जाता है कि पुनर्वास कर दिया जाएगा, लेकिन वह कब किया जाएगा, किसी को नहीं पता.

बिहार की विडंबना यह है कि उमेश दास केवल भागलपुर में नहीं हैं और न ही उनकी संख्या हज़ार पांच सौ में है बल्कि उन जैसे बिहार के कोने कोने में लाखों की तादाद में हैं.

यह बात भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की एक रिपोर्ट से भी सिद्ध होती है. आरबीआई की 2013 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश में बिहार सबसे ज्यादा गरीब राज्य है. यहां 40.69 प्रतिशत लोग गरीब हैं.

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