वैज्ञानिकों एवं कानूनविदों ने मिलकर गंगा के लिए विशेष कानून का जो प्रारूप तैयार किया था, वह गंगा को माई मानकर था

इस गंगा कानून हेतु स्वामी सानंद जी के प्राण गये; उनकी मांगों को पूरा कराने के लिए पूरे भारत में गंगा प्रेमियों द्वारा ‘गंगा सद्भावना यात्रा’ से जाग रही है चेतना

– डॉ राजेन्द्र सिंह*

वैज्ञानिकों एवं कानूनविदों ने मिलकर गंगा के लिए विशेष कानून का जो प्रारूप तैयार किया था, वह गंगा को माई मानकर था तथा हमारी संस्कृति और नित्य जीवन पवित्र गंगा जी की विशेषता उसमें अप्रतिम स्थान सुस्थापित है। पवित्र गंगा जी हमारी सभ्यता की आधारशिला हैं। भारत राष्ट्र की सर्वप्रथम अंतरराष्ट्रीय पहचान हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48(a), 49, 51 (a) को प्रभाव में लाना है।

भारत सरकार ने गंगा जी के विशिष्ट स्थान स्वीकृत किये हैं। पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के अंतर्गत अधिसूचना संख्या 328 के द्वारा 20 फरवरी 2009 को इसके प्रबंधन के निश्चित आयामों के लिए गंगा जी को ‘राष्ट्रीय नदी’ का दर्जा दिया गया था। “राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण” की स्थापना की थी। इस सरकार ने उसे रद्द करके ‘नमामि गंगे’ से भ्रष्टाचार का रास्ता खोला है। जब कि गंगा जी को गंगा कार्यों में भ्रष्टाचार मिटाने तथा भारत की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विरासत के रूप में गंगा जी को औपचारिक पद-मान हेतु राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था।

भारतीय और अन्य लोगों द्वारा राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में उनके प्रति अपेक्षित सम्मान, आदर और संरक्षण सुनिश्चित करने हेतु प्राधिकरण बनाया था। सरकार के हर स्तर (केंद्र, राज्य और स्थानीय) पर नीतियांे, योजनाओं ,निर्णयों और क्रियान्वयन में गंगा जी के संरक्षण और हित को पर्याप्त महत्व और प्राथमिकता दी गई थी। भारत सरकार ने दो नये गंगा कानून प्रारूप बनाये हंै। दोनों प्रारूपों के उद्देश्यों में अंतर है। एक का प्रकथन गंगा जी को माई मानकर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सम्मान देना चाहता है, तो दूसरा 2018 वाला प्रारूप गंगा माई से कमाई के रास्ते खोलता है।

दुनिया भर से आर्थिक सहायता लेकर मेगा प्रोजैक्ट के नाम पर गंगा के बेसिन पर नवीनीकरण और पुनर्जीवित करने के झूठे वायदे हैं। इसलिए प्रो0 जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद जी)ने आमरण अनशन किया था। अनशन के 112वें दिन दोपहर 1 बजकर 20 मीनट पर एम्स ऋषिकेश में उनका प्राणांत कर दिया। इन्होंने 22 जून को अपना अनशन शुरू किया था।गंगा कानून हेतु स्वामी सानंद जी के प्राण गये।

सरकार अभी भी उनकी मांगों को पूरा नहीं कर रही है। इसलिए प्रो0 जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद जी) की मांगों को पूरा कराने के लिए ‘गंगा सद्भावना यात्रा’ पूरे भारत में युवाओं, राजनेताओं, शिक्षकों, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा अन्य सभी लोगों के बीच गंगा चेतना जगाने का काम करेगी।

स्वामी सानंद गंगा को सरकार द्वारा कमाई का साधन बनाने के विरोधी थे। वे चाहते थे कि गंगा केवल आरती उत्सव के लिए नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट जल गुणों के लिए बचनी चाहिए। इसके राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक एवं अध्यात्मिक महत्त्व को समझकर सरकार इसे विशेष दर्जा देने वाला कानून बनाये। अलकनंदा व मंदाकिनी पर बनने वाले बाँध रद्द हों। इस पर अब नये बाँध नहीं बनें।

गंगा को निर्मल बनाने की शुरूआत अविरलता का काम करने से होगी। अविरलता के बिना गंगा का गंगत्व बचना सम्भव नहीं है। इसलिए स्वामी सानंद अपनी माँ गंगा के प्राण गंगत्व (बायोफाज) को बचाने हेतु अपने स्वयं के प्राण देने हेतु तैयार होकर गंगा जी को धोका देने वालों को दण्डित कराने राम जी के दरबार में गये हैं। उनका मानना था, ‘‘मैं भारत की जनता को नहीं समझा पा रहा हूँ, सरकार तो मेरी आवाज सुन नहीं रही है, लेकिन वह समझ रही है। मेरी आवाज तो गंगा माई के लिए है, कमाई के लिए नहीं है।’’ गंगा जी से कमाई का रुकना सरकार को मंजूर नहीं था, इसलिए वह उनसे नहीं मिली इसलिए उन्होंने यहाँ की सरकार को सुनाने के बजाय, गंगा जी को पूज्य मानने वाले राम जी के पास जाना ही उचित समझा। उन्हें वहाँ इसी सरकार ने जाने को मजबूर किया है। वे अब इस सरकार को दण्डित कराने के लिए चले गये हैं। हमें उनका साथ देना चाहिए। यह बात सभी जानते हैं। गंगा सभी की है, सब मिलकर ही इसे बचा सकते हैं। इसलिए ‘गंगा सद्भावना यात्रा’ ने अपना स्पष्ट लक्ष्य बना लिया है।

गंगा जी गरीब-अमीर, सवर्ण, दलित, हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी की समान है। यह सभी की जीवन जीविका और ज़मीर है। सभी की आर्थिक, सांस्कृतिक, आनंद और अध्यात्मक महत्त्व की गंगा जी कोे जो भी जैसा देखता है, वह वैसी ही उनकी बन जाती है। गंगा का यह गुण तो अभी भी बचा हुआ है। इसीलिए इसके किनारे बिना बुलाये करोड़ों लोग जुट जाते हैं। लेकिन हमने इनकी शक्ति से ज्यादा ज़हर इनके अंदर डाल दिया है। इनके अंदर ज़हर को पचाने की शक्ति जो इनके भवभूति बायोफाज में थी, वह इतनी नहीं थी, जितना ज्यादा ज़हर हमने इसमें मिला दिया है। हम माँ की शक्ति से अधिक जहर इन्हें खिला चुके हैं। इसी से ये बीमार होकर हाॅस्पिटल की सघन चिकित्सा में भर्ती हैं, लेकिन वहां के चिकित्सक गंगा मां की बीमारी को बिना निदान किये ईलाज किये जा रहे हैं।

चिकित्सकों की निदान पद्धति गलत है, इसलिए चिकित्सा ठीक होना सम्भव नहीं हो रही है। गंगा माँ की बीमारी रक्तचाप और जल-प्रवाह की है, जबकि गंगा माँ का ईलाज दाँतों के डाॅक्टरों से करवाया जा रहा है। हम इस काम से उन्हंे दवाई, गोली, इन्जेक्शन सभी कुछ दे रहे हैं। इनसे इनकी बीमारी दिन-रात बढ़ती ही जा रही है। ये ठीक नहीं हो रही है। शायद माँ के बेटे और बेटियाँ अब इन्हें ठीक भी नहीं करना चाहते। इसलिए सघन चिकित्सा में भर्ती करके बेहोश बनाकर हाॅस्पिटल में खर्चा ही कर रहे हैं। ‘गंगा सद्भावना यात्रा’ ‘नमामि गंगे’ की चिकित्सा से मुक्त कराके गंगा जी की मुक्ति की गुहार कर रही है। इसलिए गंगा सद्भावना यात्रा ने गंगा जन श्वेत पत्र तैयार किया है। इसे गंगा सागर में जारी करेंगे।

*लेखक जलपुरुष के नाम से विख्यात एवं रोमन मैग्सेसे एवं स्टॉकहोल्म वाटर प्राइज से सम्मानित पर्यावरणविद हैं 

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