विश्वविद्यालयों की स्थिति अत्यंत ही दयनीय – डा. अमरेन्द्र पाणि

नई दिल्ली: गत दिवस राजधानी स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में आईएआईपी प्रोजेक्ट एंड बालाजी कालेज आफ एजुकेशन द्वारा नेशनल सेमिनार आन बापू, पालिटिकल पार्टी एन्ड न्यू एज इंडिया विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में एसोसिएशन आफ इंडियन यूनिवसिर्टी के रिसर्च डायरेक्टर डा. अमरेन्द्र पाणि ने अपने सम्बोधन में कहा कि वर्तमान में विश्वविद्यालयों की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। कुलपतियों की नियुक्ति शैक्षिक मानदण्डों, अनुभवों व योग्यतानुसार नहीं होती। नतीजतन विश्वविद्यालयों की व्यवस्था, कामकाज, अध्ययन शिक्षण प्रभावित होता है। इसी का दुष्परिणाम है कि विश्वविद्यालयी शिक्षा के माध्यम से देश के नौजवान, भावी कर्णधारों के भविष्य निर्माण की संकल्पना ही अधुरा रह गयी। देश के चहुंमुखी विकास के बावजूद राजनीतिक दलों की बदहाली , उनकी सोच का दिवालियापन इसका जीता जागता सबूत है कि देश किस ओर बढ़ रहा है। जहां तक बापू का सवाल है वह तो सभा, सेमिनार, सम्मेलनों में केवल स्मरण की वस्तु बनकर रह गये हैं। इससे राष्ट्र, समाज को जो हानि हो रही है, उसकी भरपायी असंभव है।

गोष्ठी को संबोधित करते ज्ञानेन्द्र रावत, साथ बैठे हैं डा.अमरेन्द्र पाणि व पी एल कौशल किशोर

गोष्ठी में प्रख्यात दार्शनिक, विचारक और शिक्षाविद प्रो पी एल किरकिरी ने कहा कि विश्वविद्यालयों की दुर्गति के लिए हमारा नेतृत्व और संवैधानिक ढांचा जिम्मेदार है। आजादी के बाद विश्वविद्यालयों से जो अपेक्षा की गई थी, उस पर वह खरे नहीं उतरे। वाय एम सी ए यूनिवसिर्टी के साइंस एण्ड टैक्नालाजी डिपार्टमैंट आफ मैनेजमेंट, मिकैनिकल इंजीनियरिंग के डीन एवं चेयरमैन प्रोफेसर अरविंद गुप्ता ने कहा कि आजादी के बाद देश में जिस तरह सामाजिक जीवन में मूल्यों का ह्वास हुआ, उसका दुष्परिणाम यह है कि आज देश में आदर्श, मूल्य और चरित्र एक सपना बनकर रह गया है।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं पर्यावरणविद श्री ज्ञानेन्द्र रावत ने कहा कि देश आज संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। राष्ट्र को अपने इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, मान्यताओं और विभूतियों-नायकों के चरित्र, त्याग और बलिदान पर गर्व होता है। इनकी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनके बिना राष्ट्र की समृद्धि की आशा बेमानी है। लेकिन आज हम अपनी गौरवशाली संस्कृति, परंपराओं, मान्यताओं, आदर्शों, मूल्यों और विभूतियों के त्याग और बलिदान को भूल चुके हैं। जबकि समूचे विश्व में भारतीय ज्ञान -विज्ञान और संस्कृति की ख्याति का बोलवाला था। वर्तमान मैं सभी क्षेत्रों में दिखाई दे रही चारित्रिक गिरावट उसीका दुखद परिणाम है। शिक्षा का क्षेत्र ही नहीं आज कोई भी क्षेत्र इस ह्वास की स्थिति से अछूता नहीं है। एसी स्थिति में युवा पीढ़ी पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। देश टकटकी लगाये उसकी ओर देख रहा है। व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव तभी ंभव है जबकि नौजवान पीढ़ी अपने दायित्व को समझे और अपने महानायकों-महापुरुषों से प्रेरणा लें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बापू समूचे विश्व के प्रेरणास्रोत हैं। उनका बताया रास्ता ही शांति, सद्भाव, एकता और समृद्धि का रास्ता है।

अंत में गोष्ठी के आयोजक शिक्षाविद एवं पर्यावरण संरक्षण सम्मान से सम्मानित डा. जगदीश चौधरी ने कहा कि नैतिक मूल्यों का पतन गंभीर चिंता का विषय है। राष्ट्र के सर्वागीण विकास में यह सबसे बड़ी बाधा है। इसके बिना राष्ट्र की समृद्धि की आशा बेमानी है।

गोष्ठी के प्रारंभ में डा. जगदीश चौधरी,प्रो. चेतन प्रकाश व श्री अंकित शर्मा ने अतिथियों का पुष्प गुच्छ, अलोवीरा का पौधा भेंटकर व शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। गोष्ठी में श्री श्याम सुन्दर सिंह, श्री पी एल कौशल किशोर, श्री जयंत सिंह, सौरभ कांत, श्री पंकज सिंह आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर जानेमाने समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों व छात्र-छात्राऔं की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।

-जागृत बिहार ब्यूरो

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