भारतीय राजनीति में मानवता और प्रकृति का बराबर सम्मान होना चाहिए

आम चुनाव 2019 पर विशेष आलेख-2

-डॉ राजेन्द्र सिंह*

हमारा देश नीर-नारी-नदी का सम्मान करने वाला विश्व शिक्षक था। हमारा आचरण और व्यवहार कृतज्ञता से परिपूर्ण था। माँ जन्म देती, कष्ट सहती, लेकिन बदले में पैदा हुई संतान पर अतिक्रमण नहीं करती है। उसके स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखने का पूरा ख्याल रखती है। प्रदूषण से बचाती तथा शोषण भी नहीं करती है, लेकिन आज हमारे राजनेताओं के मन में मतदाताओं पर अतिक्रमण करने, सामाजिक संरचनाओं से लूट-फूट करने का विचार बहुत प्रबल हो गया है।

अब राजनीति में प्रकृति और मानवीय मूल्यों का सम्मान नष्ट हो गया है। भारतीय राजनीति तो मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि मानकर निर्मित संविधान से चलनी है। संविधान में प्रकृति और मानवता को बराबरी की संरक्षण व्यवस्था है। इस व्यवस्था को हमारे राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद भूल जाते हैं। कुछ वर्षों तक भारतीय राजनीति में इसका सम्मान करने वाली व्यवस्था को जीवित रखा था। अब अतिक्रमण करने वाले औद्योगिक घरानों का प्रभाव बढ़ गया है। इसलिए संविधान का सम्मान भी कम हो गया। संवैधानिक व्यवस्थाओं व संस्थाओं की अनदेखी करने में जुटे हैं। इस अनदेखी से भारत में अराजकता और हिंसा बढ़ेगी।

सत्य ही अहिंसा के रास्ते पर चलाता है। झूठ हमें हिंसा के रास्ते सुजाता व दिखाता है। इसलिए अब हम सत्ता पाने के लिए मिलाजुला युद्ध करने से भी नहीं बचते हैं। जब कोई राजनैतिक संगठन देश में सत्ता छोड़ने के स्थान पर युद्ध अपनाने लगे तो समझो हम अपना मूल रास्ता छोड़कर अपनी सत्ता को बनाए रखने का कोई भी रास्ता पकड़ने के लिए आसानी से तैयार हो जाते हैं। ‘सत्यमेव जयते अहिंसा मेय पथ’ पर चलकर मिला था। अब हम झूठे व लालची सपने दिखा कर सत्ता पाएंगे तो, वहीं सत्ता फिर सत्यमेव जयते की पक्षधर नहीं होकर झूठमेव जयते बन जाती है। उसमें फिर सहजता से ही हिंसा आ जाती है।

झूठ अहिंसक कभी नहीं हो सकता। सत्य ही अहिंसक होता है। वह सनातन अहिंसक बना रह सकता है। जब सत्ता और शक्तियों के लिए हम झूठे वादे करते हैं तब जनता को धोखा देते हैं। सत्ता का यह झूठ जनता को हिंसामेय रास्ते पर चला देता है। हिंसा तो मानवीय और प्राकृतिक मूल्यों को भुलाकर अतिक्रमण, प्रदूषण और शोषण करने की प्रेरणा ही देती है।

चंद परिवार ही भारत की आर्थिक व्यवस्था पर कब्जा कर रहे हैं। भारत की गरीबी इसी से बढ़ रही है। गरीबी चंद औद्योगिक परिवार सतत् बढ़ाएंगे, क्योंकि ये प्राकृतिक साझे संसाधनों पहाड़, समुद्र, नदी, जंगलों व खनिजों आदि सभी पर कब्जा ही कर रहे हैं। परिणामतः हमारे देश का बड़ा हिस्सा पानी-जवानी-किसानी की लाचारी-बेकारी-बीमारी का शिकार हो रहा है।

पानी मिट्टी काटता बह रहा है। परिणामतः बाढ़-सुखाड़ बढ़ रहे हैं। अब गांव में नौजवानों को काम नहीं है, बेरोजगारी बहुत ही बढ़ गई है। किसानों की खेती चौपट है। उन्हें उनके पसीने की कमाई का उचित दाम नहीं मिल रहा है। कर्जदार होकर लाचार-बेकार-बीमार बन रहा है। हमारे सत्ताधारी दलों के घोषणाओं में यह बातें आ भी जाएंगी तो भी सरकार बनाकर भूल जाते हैं। जैसे चुनाव से पहले रोजाना गंगा जी का स्मरण करके वोट मांगे थे, लेकिन सरकार बनाते ही भूल गए।

वर्ष 2019 के चुनाव में  ऐसा धोखा ना खाएं। इसलिए अपने उम्मीदवारों की ईमानदारी तथा पारदर्शिता जाने, उसका इतिहास जाने, भूत को भी जाने। बिना भविष्य विचार नहीं किया जा सकता है। अतः इस बार उम्मीदवार को चुने। दलगत राजनीति में भी अच्छा व ईमानदार व्यक्ति चुनकर आता है। वह बुरे कामों को रुकवाता है। अच्छे कार्य शुरू कराता है। मानवता और प्रकृति को बराबरी से सम्मान करने वाला चुनो। अहिंसक और सत्य का व्यवहारी ही देखो। प्रचारक को नहीं प्रमाणित को ही पकड़कर, देख परखकर ही चुनना चाहिए। हिंसक-भ्रष्टाचारी को ना चुने। सत्यनिष्ठा, सदाचारी और अहिंसक ही चुने। ये ही मानव प्रकृति को बराबर सम्मान करके शांतिमय समृद्धराष्ट्र निर्माण का काम करेगा। भारत को स्वावलंबी समृद्ध राष्ट्र निर्माण हेतु लालची विकास के नारों से बचाकर प्राकृतिक पुनर्जीवन के काम ही नीर-नारी-नदी का सम्मान करके काम करने वाली सरकार चाहिए। प्रकृति तथा मानवता पर अतिक्रमण-प्रदूषण व शोषण करने वाली सरकार नहीं चाहिए। हमारी राजनीति में स्पष्टता, सरलता व सादगी की राह पर चलकर समृद्धि लाने वाली व्यवस्था चाहिए।

*लेखक स्टॉकहोम वाटर प्राइज तथा मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित और जलपुरुषके नाम से विख्यात पर्यावरणविद हैं।

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