भयावह समस्या है ग्रीनहाउस गैसों का तेजी से बढ़ता उत्सर्जन

फोटो: जोश बारविक, न्यूज़ स्प्लैश

-ज्ञानेन्द्र रावत*

जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने का सवाल उतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा है। हमारे देश में भले इस बात का यह दावा बड़े जोर-शोर से किया जा रहा है कि भारत ने 2020 का कोपेनहेगन लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है लेकिन असलियत यह है कि देश को आनेे वाले समय में सतत विकास के माॅडल पर तेजी से अमल करना होगा। कारण आने वाले समय में देश की जीडीपी जिस अनुपात में बढ़ेगी, उसमें उर्जा की खपत में लगातार कमी लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह उस स्थिति में और चिंता की बात है जबकि आने वाले समय में कार्बन डाई आॅक्साइड का स्तर एक नये कीर्तिमान पर पहुंच जायेगा। इस साल वातावरण में कार्बन डाई आॅक्साइड के स्तर में 2.8 पीपीएम की बढ़ोतरी हो जायेगी। यानी इस साल कार्बन डाई आॅक्साइड का स्तर 411 पीपीएम हो जायेगा। गौरतलब है कि कुछ साल पहले ही कार्बन डाई आॅक्साइड ने 400 पीपीएम का आंकड़ा छुआ था। कार्बन बढ़ने का मुख्य कारण वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी है जिसमें लगातार तेजी से वृद्धि हो रही है। उद्योग जगत के शुरूआती काल में कार्बन डाई आॅक्साइड का आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 280 पीपीएम था जो हजारों साल के बाद इस स्तर पर पहुंचा था। खास बात यह कि उस समय यह चिंताजनक स्थिति में नहीं था। वह तो 1950 के बाद से वैश्विक वातावरण में कार्बन के स्तर में बढ़ोतरी की शुरूआत हुई। यह बढ़ोतरी हर साल एक पीपीएम के स्तर से बढ रही है। वर्तमान में यह आंकड़ा 2 पीपीएम पर पहुंच गया है। यह खतरनाक संकेत है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र् की संस्था आईपीसीसी की मानें तो उसकी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि 2040 तक दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ जायेगा। यदि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर तत्काल अंकुश नहीं लगाया गया तो 2040 तक स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जायेगी।

हकीकत यह है कि पेरिस समझौते के अनुरूप तापमान बढोतरी को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने के प्रयास नाकाफी हैं। ब्राउन टू ग्रीन-2018 की रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट में जी-20 देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों की समीक्षा की गई है। रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जाहिर की गई है कि जी-20 देशों की जीवाश्म ईंधन से निर्भरता घट नहीं रही है। अभी भी इन देशों में 82 फीसदी तक जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है। सउदी, आस्ट्र्ेलिया और जापान में तो यह निर्भरता 90 फीसदी से भी अधिक है। खास बात यह कि कई देशों में जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी भी दी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में 33-35 फीसदी तक की कमी लाने का ऐलान किया था। लेकिन उसके बावजूद पेरिस समझौते के अनुसार डेढ़ डिग्री के लक्ष्य के हिसाब से यह काफी कम है। क्लाइमेट ट्र्ांसपेरेंसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी करीब-करीब दोगुणे से भी ज्यादा बढ़ोतरी होने की आशंका है। अभी यह 2454 मिलियन टन के करीब है जो 2030 तक 4570 मिलियन टन तक पहुंच जायेगी। जाहिर है यह उत्सर्जन दो डिग्री तापमान बढ़ोतरी के परिदृश्य से भी कहीं ज्यादा है। इसलिए भारत को विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपने उत्सर्जन लक्ष्य नये सिरे से निर्धारित करने होंगे। रिपोर्ट के सह लेखक वैज्ञानिक जाॅन बर्क का कहना है कि जी-20 देशों को तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री सीमित रखने के लिए 2030 तक अपने उत्सर्जन को आधा करना होगा। लेकिन दुख की बात यह है कि इस दिशा में कोई गंभीर पहल होती दिखाई नहीं दे रही है।

जलवायु परिवर्तन का असर मौसम पर साफ-साफ दिखने लगा है। देश में बीते साल विनाशकारी घटनाओं के गवाह रहे हैं। वह चाहे उत्तरी भारत में आई धूल भरी आंधियां हों या फिर केरल की प्रलंयकारी बाढ़ जो तबाही की अहम् वजह रहीं। इस बारे में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन की मानें तो पिछले साल देश में चक्रवात, बिजली गिरने, भीषण गर्मी, कडाके की ठंड और मूसलाधार बारिश जैसी मौसम की मार से तकरीब 1428 लोग अनचाहे मौत के मुंह में चले गए। इनमें सबसे ज्यादा मौतें 590 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं। यदि हम देश के अर्थ साइंस मंत्रालय की रिपोर्ट की मानें तो बीता साल पिछले 117 सालों में छटवां सबसे गर्म साल रहा है। बीते साल देश के औसत तापमान में 0.41 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 1981-2010 के बीच के इन तीस सालों में 0.72 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई। 2018 की सर्दियों में भी तापमान सामान्य से ज्यादा ही रहा। 2018 की जनवरी-फरवरी में औसत तापमान में 0.59 डिग्री की बढ़ोतरी हुई। 1901 के बाद से यह इन महीनों में पांचवां सर्वाधिक गर्म साल रहा । बीते दशकों में 15 साल रिकार्ड सबसे गर्म साल रहे हैं। इनमें 2004 से 18 के दौरान 2009, 2010, 2015, 2016, 2017 और 2018 सबसे गर्म साल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार साल 2001-10 के बीच दशकीय तापमान सामान्य से 0.23 डिग्री ज्यादा रहा जबकि साल 2009-18 के बीच यह 0.37 डिग्री ज्यादा दर्ज किया गया। इसमें भी 2009 – 2018 सबसे गर्म दशक रहा है। इस बीच तापमान में औसत सालाना बढ़ोतरी की दर 0.6 डिग्री सेल्सियस रही है। यह इस बात का साक्षी है कि बीते दशकों में जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययन और शोध प्रमाणित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले दिनों में गर्मियां में बेहद गर्मी पड़ेगी। वैश्विक तापमान खासकर आर्कटिक में तापमान बढ़ने से वातावरण में ऐसी उर्जा उत्पन्न हो रही है जो मौसम को बेहद गर्म बना देगी। परिणामस्वरूप भारत समेत उत्तरी गोलार्द्ध के क्षेत्रों में मौसमी स्थ्तिियां निष्क्रिय हो सकती हैं और गर्मियों में भयंकर तूफान आयेंगे। अध्ययन में यह पाया गया कि तूफानों और अन्य स्थानीय, संवहन यानी उष्मा का स्थानांतरण, प्रक्रियाओं को उत्तेजित करने के लिए ज्यादा उर्जा मौजूद रहती है, जबकि कम उर्जा गर्मियों के अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय चक्रवात यानी मध्यम मौसमी तंत्र जो हजारों किलोमीटर दूर तक फैला होता है ,की तरफ जा रही है। ये प्रणालियां सामान्य तौर पर बारिश लाने वाली हवाओं के साथ जुड़ी होती हैं। अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय तूफान वायु और वायु प्रदूषण को ठंडा करते हैं, इसलिए गर्मी में कमजोर उष्णकटिबंधीय तूफानों के चलते शहरी इलाकों में वायु गुणवत्ता ज्यादा दिनों तक खराब देखने को मिलती है। इसके अलावा शहरी वायु गुणवत्ता सहित ज्यादा भयंकर तूफान और ज्यादा लम्बे समय तक गर्म लहरों के साथ ही बेजान दिनों का सामना भी करना पड़ सकता है। इसका दुष्परिणाम भारत सहित उत्तरी गोलार्द्ध के क्षेत्रों में स्थितियों के निष्क्रिय होेने से संवेदनशील क्षेत्रों खासकर आर्कटिक और दक्षिण-पूर्व एशियाई मानसूनी क्षेत्रों को अपरिवर्तनीय नुकसान उठाना पड़ सकता है। यदि अगले बीस सालों में कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो आर्कटिक महासागर ग्रीष्मकाल में बर्फ मुक्त हो जायेगा। यही नहीं सितम्बर माह में आर्कटिक महासागर से बर्फ बिल्कुल खत्म हो सकती है। इसका प्रमुख और सबसे बड़ा कारण इन क्षेत्रों का विशेष रूप से वैश्विक तापमान में परिवर्तन के प्रति संवेदनशील होना है।

अगर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन की मानें तो बीते दो दशकों में तापमान में हुई बढ़ोतरी चिंताजनक है। इसे रोकना ही होगा। जीवाश्म ईंधन पर आधारित अर्थव्यवस्था ग्लोबल वार्मिंग और जानलेवा बीमारियों को बढ़ाने का ही काम करेगी। हमारे यहां 170 से ज्यादा कोयला आधारित पुराने बिजलीघरों को हटाने में भी 30 साल लग सकते हैं। जबकि जलवायु परिवर्तन से 20 फीसदी खेती पर संकट मंडरा रहा है और इससे 200 फीसदी से भी ज्यादा लोग प्रभावित हैं। इसमें दिनोंदिन हो रही बढ़ोतरी चिंतनीय है। उस हालत में कोयला आधारित बिजलीघरों को बंद करना एक बड़ी चुनौती है। यदि ऐसा करना संभव होता है तो कोयला से पैदा होने वाली बिजली की कमी को दूर करने के लिए सौर एवं पवन उर्जा के जरिये 2030 तक एक-एक हजार गीगावाट यानी हर साल 83.3-83.3 गीगावाट बिजली पैदा करनी होगी। यह लक्ष्य 2030 तक हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती होगा। जहां तक दुनिया का सवाल है, 2030 तक दुनिया के दो तिहाई कोयला आधारित बिजलीघर बंद करने होंगे। बाकी को 2050 तक बंद करना होगा। नये कोयला आधारित बिजलीघरों की मंजूरी पर रोक लगानी होगी। यह जान लेना जरूरी है कि कोयले के इस्तेमाल से पैदा बहुत ही महीन कणों के कारण होेने वाले प्रदूषण से समूची दुनिया में सोलह फीसदी लोग और भारत में 12 लाख चालीस हजार लोग अनचाहे मौत के मुंह में चले जाते हैं। सौर उर्जा, वन क्षेत्र में बढ़ोतरी, एलईडी लाइटों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन, स्माॅग टाॅवर और स्पेस फ्यूल का प्रयोग ग्रीन हाउस गैसों पर रोक लगाने में कारगर हो सकता है। इस सबके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति बेहद जरूरी है। इसके बिना ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक की उम्मीद बेमानी है।

*वरिष्ठ पत्रकार , लेखक एवं पर्यावरणविद्
अध्यक्ष, राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति

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