प्राणी मात्र का संपूर्ण जीवन ही संग्राम का प्रतिरूप है

विजयादशमी पर विशेष

 -ज्ञानेन्द्र रावत

विजय की भावना व्यक्ति और राष्ट्र् को उल्लास और उमंग के वातावरण से सराबोर कर देती है। यथार्थ में विजय और पराजय युद्ध प्रक्रिया, भले ही उसका स्वरूप कैसा भी रहा हो, के द्योतक हैं। हमारे मनीषियों ने जीवन की प्रक्रिया और उसकी विभिन्न दशाओं, अवस्थाओं पर गहन चिंतन-मनन के बाद निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि मानव या प्राणी मात्र का संपूर्ण जीवन ही संग्राम का प्रतिरूप है। जीवधारी संसार में आते ही रण क्षेत्र में उतर जाता है क्योंकि जीवन एक रण क्षेत्र है। जीवन में हरेक प्राणी को कदम-कदम पर अपने अस्तित्व की रक्षा करने, आगे बढ़ने और जीवन को सर्वोन्नत बनाने के लिए अन्य प्राणियों से संघर्ष करना पड़ता है। यह प्राणी की स्वाभाविक प्रकृति है। इसे आगे बढ़ने की लालसा कहें, स्वाभाविक प्रकृति या होड़ कहें, यथार्थ में ’जीवन संग्राम’ ही है। जीवन में मानव की विजय वास्तविक रूप में इस संघर्ष में किस रूप में होती है, इसी को समूचे चराचर जगत को बताने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था। गीता में  मानव को लक्ष्य बनाया गया है न कि अर्जुन को, जबकि वहां तो अर्जुन मानव का ही प्रतीक है। महाभारत रूपी घटना से ’धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ नामक शब्दों से कर्मभूमि की ओर और ‘युयुत्सर्वः’ पद से जीवन संग्राम को परिभाषित किया गया है। ‘मामकाः पाण्डवाः’ शब्द स्पष्टतः दैवी रूप और आसुरी वृत्तिधारियों को लक्ष्य करके कहा गया है। इस जीवन संग्राम रूपी कर्मक्षेत्र में उतरने वाले प्रत्येक प्राणी की यही सबसे बड़ी इच्छा होती है कि वह समूचे प्राणी जगत में ऐसा बने ताकि उसके विजयी होने पर हर कोई उसके विजयी रूप के प्रति दूसरे को बता सके। यह तभी संभव है जब वह व्यक्ति विशिष्ट शक्तियों से युक्त हो। ऐसा न होने पर ऐसी इच्छाऐं सहज होते हुए भी ‘उत्पद्यनो विलोयन्ते अशक्तानां मनोरथाः’ ही सिद्ध होती हैं। मान्यता है कि सर्वगुण और विशिष्ट शक्ति सम्पन्न पुरुष ही सर्वत्र विजय का अधिकारी होता है। मनीषियों की यह स्पष्ट मान्यता है कि शक्तिलाभ के उद्देश्य से ही समस्त भारतीय शास्त्रों की रचना हुई है। नवरात्र में पूजा-जप-तप-व्रत और स्तोत्र पाठ भी इसी शक्ति पूजा के प्रतीक हैं। पूजा के इन नौ दिनों के उपरांत लोकमाता विजया के पूजन के रूप में मनाया जाने वाला पर्व ‘विजया दशमी’ भी विजय उत्सव ही है। इससे परिलक्षित होता है कि जीवन संग्राम में विजय पाने का शक्ति की उपासना से घनिष्ठ सम्बंध है।

विजय जहां राष्ट्र् को एकता के सूत्र में बांधती है, वहीं विजयोत्सव और विजय के प्रतीक के रूप में निर्मित स्मारक राष्ट्र् की पहचान बन जाते हैं। विजय के साथ सदैव सेनानायक का नाम जुड़ा रहता है। विजयोत्सवों में नायक का नाम नहीं लिया जाये, यह संभव नहीं रहता। भारतीय इतिहास में विजयादशमी एक ऐसा पर्व है जो असलियत में हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। लगभग दस हजार वर्षों से भी अधिक का समय बीत चुका है लेकिन राम की रावण पर विजय का यह पर्व हम आज भी उसी उल्लास और उमंग के साथ मनाते हैं। अक्सर रावण दहन कर हम सत्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। यहां यह जान लेना जरूरी है कि यद्यपि राम ने लंकाधिपति रावण पर विजय प्राप्ति की थी लेकिन उनका शत्रु रावण नहीं बल्कि उसका पापाचार था, दुराचार था, अधर्म था, असत्य का मार्ग था। यदि लंका को जीतना ही श्रीराम का उद्देश्य होता तो जीती हुई लंका रावण के ही भाई विभीषण को वे लौटा नहीं देते। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि विभीषण का मार्ग धर्म का, सत्य का था और वह सत्य के मार्ग का अनुयायी था। यथार्थ में श्रीराम मात्र रावण विजेता नहीं थे, असलियत में वह कर्म विजेता थे। उन्होंने शत्रु यानी दुराचार, अधर्म और असत्य को परास्त कर धर्म, सदाचरण और सत्य की प्रतिष्ठा की। चूँकि  श्रीराम ने युद्ध से पूर्व शक्ति की पूजा की, आराधना की, साधना की और शक्ति प्राप्त कर विजय प्राप्त की, इसलिए बाह्य साधनों के साथ-साथ आंतरिक शुद्धता, शक्ति संपन्नता, धर्मानुसरण और सत्य के मार्ग का पथिक होना मनुष्य के लिए परमावश्यक है। यही विजयादशमी का संदेश है।

असलियत में विजय पर्व का यथार्थ यही है कि हम इसे रावण पर राम की विजय कहें या अधर्म पर धर्म की विजय, उसे किस दृष्टि से देखें। इसका वास्तविक महत्व तो यही है। लंका काण्ड के अंत में वर्णित दोहे-‘समर विजय रघुवीर के चरित जे सुनहिं सुजान। विजय विवेक विभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान।।’ के अनुसार विजय विवेक और विभूति नामक ये तीन वस्तुएं प्राप्त होती हैं जिनका मानव जीवन में बड़ा महत्व है। यह उन्हीं को प्राप्त होती हैं जो सुजान होते हैं। यहां सुजान का तात्पर्य है सद्कर्म करने वाला, सदाचरण का पालन करने वाला। यानी धर्मानुरागी व्यक्ति ही इसका अधिकारी है। सच तो यह है कि विजय पर्व का उत्सव तो एक-दो दिन का ही होता है, उसका आनंद भी क्षणिक होता है। यथार्थ में मानव के सम्पूर्ण जीवन में इन तीन वस्तुओं की परीक्षा पल-पल पर होती है। यदि हम इस पर्व के परिप्रेक्ष्य में छिपे संदेशों पर चिंतन-मनन करें और उनका पालन व निर्वाह अपने जीवन में करें, तभी इस पर्व की सार्थकता संभव है अन्यथा नहीं। वर्तमान में आज मानव का एकमात्र उद्देश्य अधिकाधिक रूप से भोग की प्राप्ति है, यह संभव भी हो जाये लेकिन क्या रावण पर विजय संभव है, सत्य के मार्ग का अवलम्बन किये बिना तो कदापि नहीं। यह विचारणीय है। वस्तुतः अंदर के रावण पर विजय ही जीवन का मूल है, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।

यह पर्व वास्तव में सांसारिक जीवन का खुला चिट्ठा प्रस्तुत करता है। यथार्थ में यह समाज के स्वरूपों, प्रवृत्तियों और समाज की दिशा को समझने-बूझने की एक जबरदस्त कसौटी है। यह हमें राजनीति के अर्थ, राजनीति और कूटनीति के भेद-विभेदों, परस्पर सम्बंन्धों के निर्धारण के सिद्धांत, रण-कौशल, शासन-व्यवस्था के लिए आवश्यक चातुर्य आदि का विस्तृत ज्ञान देता है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं है कि इसके कुछ पात्र ऐसे हैं जो शुरू से ही समाज में अपनी पैठ बनाए हुए हैं, यदि उनके बारे में सही समझ पैदा करने में कामयाबी पाने में समर्थ हो सके तथा उसको मर्यादित करने के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त कर, उन पर अमल कर लिया जाये, तो राम राज्य की कल्पना को साकार कर पाना असंभव नहीं होगा। असलियत में यह पर्व हमें अपने अंदर के दशानन को पहचानने, उसका दमन करने का संदेश देता है लेकिन दुख इस बात का है कि फिर भी हम अपने अंदर बैठे दर्जनों रावण को वैसा ही रहने देते हैं। उनका दमन किए बगैर क्या विजयादशमी सार्थक हो सकती है? विडम्बना है कि अधर्म रूपी पुतले का दहन करने के बाद भी सर्वत्र बुराई का बोलबाला है, भ्रष्टाचार हम सबके दिलोदिमाग में बैठा सबसे बड़ा रावण है, इसे और जात-पात, छुआछूत, भेदभाव, असमानता, सांप्रदायिकता, संकीर्णता, वर्ण भेद, वर्ग भेद और उंचनीच जैसे रावण का दमन करने में क्या हम कामयाब हो सके हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि रावण दहन के विशालकाय और भव्य आयोजनों में खर्च होने वाले धन का स्रोत क्या है, वह ईमानदारी से अर्जित धन है? यदि वह बेईमानी और धोखाधड़ी से अर्जित धन है, तो उससे बुराई के प्रतीक रावण के पुतले के दहन समारोह के आयोजन का औचित्य ही नहीं रह जाता। इस अवसर पर हमें पुनरीक्षण करना होगा और अपने मन से यह निकाल देना होगा कि अकेले रावण का पुतला जलाने से बुराई का खात्मा हो जायेगा। हमें अपने अंदर के रावण पर विजय प्राप्त करनी होगी, तभी विजयादशमी के पर्व की सार्थकता सिद्ध होगी।

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार, एवं पर्यावरणविद् हैं । यह आलेख उनके निजी विचार हैं ।

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