निजी जल कम्पनियाँ दुनिया में जल संकट पैदा कर रही हैं

-डॉ. राजेन्द्र सिंह*

दो सौ वर्ष पहले तक हमारे देश में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ का सन्देश चलता था। उसी दौरान उत्तर-पश्चिम के देशों ने पूर्व के देशों पर कब्जा कर लिया। वही काल था, जब उत्तर-पश्चिम के देशों में औद्यौगिकरण बढ़ा । तभी उनकी सब नदियाँ बहुत प्रदूर्षित हो गई थीं और तभी यहाँ की कम्पनियों ने बड़े स्तर पर जल व्यापार आरभ्म कर दिया था। पहले ये जल-मार्ग से यातायात द्वारा व्यापार किया करते थे, फिर उन्होंने जल को बचाना आरम्भ कर दिया। नदी और मानव जलाधिकार समाप्त किया। उस कम्पनी का अधिकार कायम कर दिया। कम्पनियों ने शहरों में पहले पाईप से फिर टैंकर व बोतल से जल बिक्री आरम्भ की थी। फ्रांस जैसे अफ्रिका के देश बडी संख्या में उनकी कॉलोनी थे। जैसे भारत इग्लैण्ड की कॉलोनी था। इसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा ही भारत में अपना राज्य कायम किया था। आज ईस्ट इण्डिया कम्पनी तो नहीं है, लेकिन ‘विलोलिया’ उससे भी ज्यादा खतरनाक कम्पनी है। उसने भी अपने नाम में इण्डिया जोड़कर ‘विलोलिया इण्ड़िया‘ नामक कम्पनी बनाकर भारत के 18 देशों में व्यापार आरम्भ किया है। उसका इरादा ईस्ट इण्डिया कम्पनी जैसा ही है। भारत सरकार ‘विलोलिया इण्डिया’ जैसी कम्पनियों को जल व्यापार का वैसा ही अधिकार दे रही है। यह कम्पनी ज्यादा चालाक है, इसलिए भारत में जलापूर्ति सुधार सेवा के नाम पर काम कर रही है। उसने सबसे पहले नागपुर शहर में काम शु़रू किया था, अब 18 अन्य शहरों में भी शुरू कर चुकी है। इस कम्पनी ने ऐसा ही काम दुनिया के सैकड़ों देशो में आरम्भ कर दिया है। मरकेश के बादशाह और बेपानी देश की सरकारों के नेताओं व जल मंत्रियों ने इन्हीं कम्पनियों के साथ मिलकर 1997 में ‘विश्व-जल समिति’ गठित की थी। शुरू में यह समिति बेपानी देशों में पानी का संरक्षण व पानी की व्यवस्था हेतु तन्त्र विकसित करने की बात कह रही थी। उसने जल तन्त्र विकसित  करके सब के लिए जल उपलब्ध कराने की लोकहित व्यवस्था खड़ी करने का नारा दिया था; जिसमें दुनिया को जल सुरक्षा एवं जल की रणनीति ही मुख्य थी।

2006 में आते-आते टर्की में आयोजित विश्व-जल मंच में इन्होंने जलाधिकार प्रकृति और मानवता से छीनकर कम्पनियों को देना आरम्भ कर दिया। जल के सामुदायिकरण को निजीकरण में बदल दिया और इस ‘विश्व-जल समिति’ ने अब ‘विश्व-जल मंच’ के आयोजन की फीस लेना भी आरम्भ कर दिया।

अभी तक यह मरक्को, हेग, क्वटो ़़में सम्मेलन आयोजित कर चुके थे। उनसे आयोजन करने के बाद अपनी बौद्धिक व नाम के उपयोग करने की फीस नहीं देते थे। अब तो उन्होंने जल मंच की 40 लाख यूरो फीस लेना शुरू कर दिया। इस मंच में जो अपना-अपना स्टॉल लगायेगा, वह आयोजक को फीस देगा। आज तक हुए सम्मेलनों में अब तक 14 से 27 तक क्षति पूर्ति हुई है। इस बार अफ्रीका के ग़रीब देश स्नैगल की राजधानी उकार में 2021 में यह मंच आयोजित होगा। उनसे भी इन पानी की कम्पनियों ने बडी़ फीस (40 लाख यूरो) वसूलना शुरू किया है। यह देश प्राण देकर भी इसे जमा करा रहा है।

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ या उसकी शाखाओं को ऐसे ग़रीब देशों को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। ग़रीब देश कर्ज़ लेकर ऐसा काम करता है। उसकी कर्ज़ से कमर टूट जाती है। हमें कर्ज़ मुक्ति के लिए खड़े होकर स्नेगल और डकार में मदद हेतु वहाँ जाकर उनकी मदद करनी चाहिए। मंच की सच्चाई स्नेगल की जनता को बताना जरूरी है।

‘विश्व-जल समिति’ निजी कम्पनियों को मंच है। यह अपने को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ का अंग बोलकर दिखावा करके दुनिया को भ्रमित कर रहा है। दुनिया को इनके भ्रम-जाल से बचाना जरूरी है। इस मंच पर कब्ज़ा करने वाली कम्पनियाँ खुल्लम-खुल्ला अपने आप को राष्ट्र संघ का अंग कह कर संयुक्त राष्ट्र संघ की शाखाओं को गुमराह करके दुनिया के  भ्ू-जल  भण्ड़ारों पर कम्पनियों का कब्जा कराने में जुटी हैं।

इन्होंने ब्राजिल, टर्की, मरक्को आदि बहुत से देशों के भू-जल भण्ड़ारों पर कम्पनियों के कब्ज़े करा दिये हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ गहरी नींद में सोया हुआ है, बहुत प्रयास नहीं कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में जल का एक अलग से विभाग है, वह भी कुछ नहीं कर रहा। उनका नाम लेकर ये निजी कम्पनियाँ अपना उल्लू सीधा कर रही हैं। अब पूरी दुनिया इस संगठन के दुष्कर्मों का शिकार हो रही है। ‘‘सबका जल एक कम्पनी का बनना‘‘ जल जीवन है। इस जीवन का व्यापार कोई एक कम्पनी कैसे कर सकती है?

भारत में जीवन मूल्यों, व्यवहार और जल संस्कार का आचार रहा है। ‘‘अतिथि देवो भव‘‘ जल से आरम्भ ‘‘जल सम्मान अनुशासित उपयोग  प्रक्रति पुनर्जन्म का आचार मान कर हम जल-व्यवहार करते हैं। ऐसा दुनिया के दूसरे देशों में नहीं होता। अब हमारे देश का व्यापार यह सिद्ध कर रहा है। दुनिया में भी जल का निजीकरण जल-व्यापार का आधार बन गया है। पहले कम्पनियाँ जल को प्रदूषित करती हैं, फिर उसका शोधन पुनर्शोधन,  पूनरुपयोग करने की बात ग़रीब देशों को बोलती हैं। ये कम्पनियाँ जल को दूषित करके स्थान बदलती रहती हैं।

ग़रीब इनके प्रदूषण से लाचार, बेकार और बीमार होकर मरते रहते हैं। वे तो लाभ कमाकर भाग जाते हैं, फिर जल का शोधन, परिशोधन और पूनरुपयोग के नारे देकर ग़रीब देशां को कर्ज़ में दबाते जाते हैं। यह इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा षड़्यन्त्र है। इस षड़्यन्त्र और जल संकट से बचने के लिए सारी दुनिया जल सत्याग्रह करे।

*लेखक जलपुरुष के नाम से विख्यात और मैग्सेसे तथा स्टॉकहोल्म वाटर प्राइज से सम्मानित पर्यावरणविद हैं और यह इनके निजी विचार हैं।

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1 Comment on निजी जल कम्पनियाँ दुनिया में जल संकट पैदा कर रही हैं

  1. Bharat kumar // August 5, 2019 at 8:44 am // Reply

    Very nice article sir

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