जीवन का शुभारम्भ ही नीर है

विशेष आलेख

 डॉ राजेंद्र सिंह*

परिवर्तन : जब आक्रोश सहन न होने के कारण कुछ लोग स्वयं में, तीव्रता से, आवश्यक बदलाव लाते हैं और समाज और राष्ट्र के लिए नये आदर्श बन जाते हैं। तब उनके अनुकरण में समाज में छोटे-छोटे परिवर्तन होते हैं और फिर निसर्ग-मारक से निसर्ग-पूरक जीवन-शैली अपनाने का प्रयास जब व्यक्ति करते हैं, तो वह उसका निजी-परिवर्तन का मार्ग बन जाता है। निजी-परिवर्तन से ही समाज ही और पर्यावरणीय परिस्थिति में ‘बिगड़ी को बनाने वाला और बनाये रखने वाला’ परिवर्तन बनता है।

विकास : परिवर्तन से हुए निर्माण को कई बार लोग रचना और विकास कहते हैं। जीवन की आवश्यकता के लिए समाज की जीवन-धारा में लाया गया जीवन-पूरक बदलाव जब संस्कार से समाज की संस्कृति बन जाये तो वह मानव-प्राकृतिक रिश्ते को परस्पर-पूरक और पोषक बनाये रखता है और आगे जाकर बदलती हुई परिस्थिति के अनुसार दिशा-दृष्टी में भी विकास लाने की आवश्यताएँ भी जीवित रखता है। यह जीवन-पूरक बदलाव ही विकास है। विस्थापन आरम्भ करने वाला विकास ही विकृति पैदा करता है। यही विनाश का रास्ता बनाता है। विस्थापन, विकृति, विनाश मुक्त विकास, स्थाई विकास ही ज्ञान, हरियाली, मिट्टी, जल जंगल, परम्परा – संस्कृति का संरक्षण करने वाला ही सनातन सदैव, निल्य, नूतन निर्माणकारी, विकास ही स्थाई विकास है। यही पुनर्जीवन है।

पुनर्जीवनः क्रांति, परिवर्तन और विकास के यशस्वी प्रयोग से जब आशा के बीज प्रेरित और प्रस्फूटित होते है और इससे समाज का प्रकृति पूरक कार्य व्यापक बनता है। मारक-जीवनशैली से विस्थापित और विनाश हुई प्राकृतिक धाराएँ, मानव-निष्ठा और मानव की शृमनिष्ठान से संजीवनी पाकर, फिरसे, प्रस्फूटित और स्वयं-प्रवाहित हो जाती है तो पुनर्जीवन होता है। यही प्रक्रिया पंचमहाभूतों के संरक्षण से प्रारम्भ होती है। आज प्राकृतिक संकट से धरती को बुखार और मौसम का मिजाज बिगड़ा है। इसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। यह बिगाड़ विकास ने किया है। इसलिए 21वीं शदी में विकास नहीं चाहिए। भारत को पुनर्जीवन, पुनर्भरण चाहिए। इसकी शुरूआत जल ही जीवन है। हम जल को समझेंगे, सहेजेंगे और समझाऐंगे। पूरे विश्व को जलसाक्षर बनाने का काम करेंगे। गंदे जल को स्वच्छ जल में नहीं मिलने देंगे। वर्षा जल से धरतीमाता का पेट पानी से भर देंगे। हम हमेशा जल की स्वच्छता और पवित्रता के सिद्धांतों का पालन करेंगे। हम संकल्प करते है, इसका उपयोग पूरी प्रकृति के जीव-जगत के लिए नीर-नारी-नदी को सम्मान देकर ही करेंगे।

नीर : जीवन का शुभारम्भ ही नीर है, यह ब्रह्माण्ड, सृष्टि, प्रकृति, धरती और पंचमहाभूतों का विलय करने वाला इस सृष्टि का सबसे सशक्त महाभूत है।

नारी : नीर से निर्मित नया जन्म देने वाली माता, प्रकृति, धरती, नारी ही सबको जन्म देती है और सबका पोषण करती है – वही माँ और नारी है।

नदी : नीर से निर्मित नारी ने अपने जीवन को चलाने के साधन पैदा करने के लिए जो मुक्त प्रवाह निर्माण किया, जो अविरलता, निर्मलता और स्वतंत्रता से बहता है, वह नदी है।

क्रांति : जब परिस्थिति के भीतर उपस्थित आक्रोश को संवेदनशील मानव सहन नहीं कर पाता तो वह विचार क्रांति की ओर बढ़ता है – ताकि पर्यायी व्यवस्था बन सके या वर्तमान व्यवस्था में अंतर-बाह्य उत्क्रांति शुरू हो जाये। यह वैचारिक क्रांति जब व्यवहार में आने लगती है तो उसे परिवर्तन कहते हैं।

*लेखक मैग्सेसे तथा स्टॉकहोल्म वाटर पुरुस्कार से सम्मानित और जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरणविद हैं 

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