जल जन जोड़ो आन्दोलन से ही बनेगा पानीदार भारत

जल संवर्धन पर प्रधान मंत्री की 'मन की बात' अच्छी आशा जगाती है

डॉ. राजेन्द्र सिंह*

प्रधान मंत्री की ‘ मन की बात’ अच्छी आशा जगाती है। उन्होने राजस्थान के जोहड़, तेलंगाना के काकतीया ताल, बैलूर, तमिलनाडु की संगठित महिलाओं के प्रयासों से निर्मित जलसंरचनाओं की सफलता पर बोलकर एक नया रास्ता खोजा है। सामुदायिक जलसंरक्षण कार्यों की अब भी सफल सिद्धि को पुन: अपनाने की जनता से अपील करके लोगों के उत्साह वर्धन का प्रयास किया है यही जलक्रांति बन सकती है जिससे भारत को पानीदार बनाया जा सकता है।

श्री नरेन्द्र मोदीजी की ‘मन की बात’ से जल को सम्मान मिलगा। दुनिया में एकमात्र भारत ही है जहाँ जल को सम्मान, अनुशासित उपयोग, जल शोधन, जल परिशोधन, जल पुनरुपयोग और जल से प्रकृति को पुनर्जीवित करने वाला महातत्व माना जाता है। दुनिया भर में जल के लिए शोधन, परिशोधन, पुनरुपयोग तीन शब्द ही उपयोग होते है। भारत में इस हेतु छः शब्द उपयोग होते है। जल सम्मान, अनुशासित उपयोग, शोधन, परिशोधन पुनरुपयोग, जल से यही प्राकृतिक पुनर्जीवन भारत का विशिष्ठ जल ज्ञान, व्यवहार, संस्कार को जीवन मूल्यों के साथ जोड़ता है, अभी हम इसे भूल रहे हैं इसलिए जलसुरक्षा कानून की अत्यंत आवश्यकता है। ‘मन की बात’ से हमारी भूल सुधार की तरफ बढ़ना जलसुरक्षा कानून बनाकर ही अच्छा होगा।

भारत सरकार जनशक्ति को जल शक्ति के लिए काम करने हेतु प्रेरित करने में जुटी है। इस काम की सफलता राज-समाज से जुड़कर होगी। जल के लिए जन जुड़ें। भूजल भरे, जलस्तर ऊपर आयेगा। तब ही नदियां शुद्ध-सदानीरा बनकर बहेंगी। मिट्टी की नमी से धरती का बुखार कम होगा। मौसम का मिजाज सुधरेगा। इस सदी का यही सबसे जरूरी काम है। जल से ही जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और अनुमूलन का काम सम्पन्न होगा।

पानीदार भारत बनने का सपना साकार करने हेतु हम सभी को एक होकर जुटना जरूरी है। हकदारी को जल जिम्मेदारी से पूरा करना सीखें। सरकार भी ठेकेदारी मुक्त समुदायिक जल प्रबन्धन का सम्मान करे। जल का निजीकरण रोकें, सामुदायीकरण करें। जल सबका है, सभी के लिए समान है। जल ही जीवन, जीविका, जमीर है। “जल ही सत्य है” यही संविधान का प्रकाश भी है। जल पर सम्पूर्ण प्राणीजगत का अधिकार है, यही कानून व्यवस्था जलशक्ति से नल द्वारा हर घर में जल प्रदान करेगा, तभी जल नल योजना सफल होगी इसी जन जल से जुड़ेगा और पानीदार भारत बनेगा।

भारतीय समुदाय और समाज हकदारी से जिम्मेदारी पूरी करता है। जल पर समाज का और सरकार का समान हक है। जल तो सभी को समान है, जल ही जीवन है। संविधान जीवन का हक देता है, जीवन के लिए जल दिलाने वाले कानून की तत्काल जरूरत है 3 जुलाई 2019 को यही बात त्रिपुरा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी जी ने बहुत जोर देकर कही। जल सुरक्षा कानून बनना ही चाहिए। जल सुरक्षा कानून के प्रकाश से समाज जल संरक्षण को अपना कर्त्तव्य एवं अधिकार मानकर जल संरक्षण व सामुदायिक-विकेन्द्रित प्रबन्धन में जुट जायेगा। समाज का मालिकाना भाव ही जिम्मेदारी निभाने का अहसास कराता है। समाज को दक्ष और कौशल बनने का आभास भी जल संरक्षण के काम से ही होता है।

स्वच्छ भारत और पानीदार भारत में मूल भूत अन्तर होगा। स्वच्छता हमारे व्यवहार और संस्कार की देन होती है, परन्तु पानी तो प्राण है। इसके लिए कई कानून-कायदे है, जो जल संरक्षण व प्रबंधन में अड़चन डालते है। इनसे डर कर कोई जलसंरक्षण कार्य नहीं कर पाता है। दूसरी ओर घर की छत के जल के संरक्षण हेतु कानून बना हुआ है। उसका उपयोग इसलिए नही होता है क्योंकि शहरों का नल जल सस्ता है। वहाँ पर्याप्त जल उपलब्ध है और वर्षाजल से यह सस्ता है इसलिए लोग इस कानून का पालन नहीं करते,भष्टाचार के कारण कानून पालन कराने का प्रयास भी नहीं होता, ऐसे में पानीदार भारत बनाने का आन्दोलन अलग तरह से चलाना होगा। इस हेतु जलसाक्षरता संवर्धन के लिए जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए, वर्षा चक्र को फसल चक्र के साथ जोड़ने हेतु कार्य करना होगा।

जल पर सभी का अधिकार होता है। गन्दगी पर कोई अधिकार रखना नही चाहता। गन्दगी से मुक्ति को सभी तैयार है। कोई भी अपना कचरा देने के लिए सदैव तैयार रहेगा। पानी देने हेतु कोई नेता, अधिकारी, कर्मचारी और जन सेवक या कार्यकर्ता, आमजन तैयार नहीं हैं।कानून के बिना भी स्वच्छ भारत हो सकता है। अब तो पानीदार भारत बनाने का शुभारंभ जल-कानून से ही होगा।

सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक सन 2040 तक भारत की 40 फीसदी आबादी को पानी मुहैया नहीं हो पायेगा

हमें पूरे देश में जीवन के लिए जल-साक्षरता बढ़ानी होगी। जल-साक्षरता से ही अब संरक्षण आरम्भ होगा, यही कार्य पूरे भारत में करना होगा। कोंकण, मेघालय में देश का सबसे ज्यादा वर्षाजल होने के बाद भी जलसंकट है।सामुदायिक प्रक्रिया से राजस्थान ने सबसे कम वर्षा जल से अपने को पानीदार बनाया है पहले लोग यहाँ लोग बेपानी थे। अब बेपानी से पानीदार बन गये हैं। पहले तो बिना कानून सामुदायिक जलप्रबंधन हो जाता था अब जीवन में जटिलतायें बढ़ गई हैं इसलिए अब जलसुरक्षा कानून की जरूरत है अब उसमें सरकारी कानून और समाज की भागीदारी दोनो को बराबरी से हकदारी और जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी होगी तभी यह पानीदार भारत बनेगा। जल से जन को जोड़ने वाले प्रधानमंत्री के मन की बात अच्छी शुरुआत कही जा सकती है। इसे आगे बढ़ाने के लिए जल के ठेकेदारो से मुक्ति भी जरूरी है। ठेकेदार का लाभ-शुभ को खा जाता है। पानी तो पुण्यकर्म है। इस पुण्य कर्म में लाभ नही चलेगा केवल शुभ ही टिकेगा और पानीदार भारत आन्दोलन को आगे बढ़ायेगा। वर्षा ऋतु आ गई है। इस में जल साक्षरता, जल संरक्षण को समझाने का शिक्षण प्रशिक्षण हो सकता है। भारत के बड़े-बूढ़े आज भी बोलते है, “पानी आने से पहले जो पाल बाँधता है, वही पानीदार बनता है।” अतः अगले साल का पानी आने से पहले हम पूरी तैयारी करके वर्षा ऋतु से पहले पाल बाँध कर धरती का पेट पानी से इस प्रकार भरें जिसे सूरज चोरी नहीं कर सके। सूरज की टेढ़ी नजर जल को उड़ा देती है। वर्षा जल का वाष्पीकरण हो जाता है। वाष्पीकरण जरूरी है। वाष्पीकरण समुद्र का ही होना अच्छा है। समुद्र का खारा पानी मीठा तो सूरज ही बनाता है। सूरज की लाल गर्मी समुद्र के खारे जल को मीठा करके बादल में नीली गर्मी में बदल जाती है। यह नीली गर्मी सदैव हरी गर्मी की तरफ जाती है। हरी गर्मी और नीली गर्मी मिलकर वर्षा करते हैं। वर्षा जल मिट्टी में मिलकर उसमें नये उत्पादन की शक्ति पैदा करता है यही जलशक्ति पीली गर्मी कहलाती है। जल में अन्न उत्पादन की पुरषत्व शक्ति भी है, यही जल नारीत्व शक्ति से इस सृष्टि के कुल 118 तत्वों से 109 तत्व को अपने में घोलकर विलीन करता है। जल की विलीन शक्ति नारीत्व शक्ति है। उत्पादन करना नारीत्व की पहचान है। इसको मानव ही अपना अधिकार जमाकर जल का मानवाधिकार सिद्ध करने में संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के सभी राष्ट्रों ने हस्ताक्षर कर दिये हैं।भारत के लोग जल को प्रकृति प्रदत्त मानते हैं, मानव की उत्पत्ति जल बिन संभव नहीं है इसीलिए जलपर पेड़, पौधे और जीव जन्तुओं सभी का समान अधिकार मानते हैं। नदियों को माँ हम इसीलिए कहते हैं। क्योंकि नीर निर्मित मानव के जीवन को प्रावह तो नदियाँ ही देती हैं नीर जीवन है, नारी जननी है, मानवीय जीवन को प्रवाहमान बनाने वाली को ही हम नदी मानते हैं। नीर नारी नदी का हम इसीलिए सम्मान करते हैं।

जब समाज मिलकर कोई भी जलसंरक्षण कार्य करता है तब सिचांई विभाग का कानून अड़चन बन जाता है, समाज को काम नहीं करने देता है। जलसंरक्षण में बाधक कानून हटेगा तभी जल संरक्षण के काम को प्रोत्साहन मिलेगा ऐसी व्यवस्था पूरे देश के लिऐ बने। यही जल से जन को जोड़ने वाले आन्दोलन की आज जरूरत है।

*लेखक मैग्सेसे एवं स्टॉकहोम वाटर प्राइज से सम्मानित और जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरणविद हैं।

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