चुनावी घोषणा पत्रों और मीडिया में लोक लुभावने वादों द्वारा लोगों को लूटा जा रहा है

आम चुनाव 2019 पर विशेष आलेख -3

-संजय सिंह*

देश में 17वी लोकसभा के चुनाव का आगाज हो गया है चुनावी प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है, इस बार आम आवाम का चुनाव 7 चरणों में मतदान के बाद सम्पन्न होगा, लोकसभा चुनाव में सभी राजनैतिक दल किसी भी प्रकार से सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी कोशिशें कर रहे है, इन कोशिशों का सिर्फ एक ही उददेश्य है कि किसी भी प्रकार से सत्ता हासिल हो, एक दूसरे के प्रबल विरोधी आज सत्ता के लालच में गैर वैचारिक गठबंधन कर रहे है। जनता के असली मुददे गायब है भारत के वर्तमान में 362 से अधिक जिले सूखे से प्रभावित है 16 राज्यों में जल संकट की समस्या गहराती जा रही है, देश की 90 प्रतिशत छोटी नदियां या तो सूख गयी है सिर्फ बरसात के दौरान ही उनमेें जल का प्रवाह रहता है। देश की प्रमुख नदियों की भी स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है देश में करोडो लोगों की आस्था का प्रतीक गंगा नदी आज पहले से और अधिक प्रदूषित हुयी है। यह बात नीरी ने अपनी रिर्पोट में उजागर की है। गंगा में ’नमामि गंगे’ जैसी परियोजनाओं से सिर्फ सुन्दरीकरण का कार्य किया गया है। अविरलता जैसे महत्वपूर्ण विषय को अनदेखा किया गया है आज नदियों को विकास के नाम पर बर्बाद किया जा रहा है, भारत मेें आवश्यकता से अधिक बिजली का उत्पादन हो रहा है फिर भी नदियों पर बिजली उत्पादन के लिए बांध बनाये जा रहे है, जबकि वर्षा जल के संचयन के लिए कोई कारगर उपाय नहीं किये जा रहे है। भारत में तालाबों की संस्कृति खत्म हो रही है, हजारो-हजार साल पुराने तालाब देखरेख के अभाव में नष्ट हो रहे है, जल संचयन का समूचित प्रंबधन ना होने के कारण वर्षा का जल बेकार बह कर समुद्र में जा रहा है, सतही जल के रोकने के लिए परम्परागत एवं देशज ज्ञान का उपयोग नहीं किया जा रहा है।

महाराष्ट्र जैसे राज्य जहां आजादी के बाद से सबसे अधिक सिंचाई के बांधों का निर्माण किया, आज यह राज्य गम्भीर सूखे के संकट से जूझ रहा है। महाराष्ट्र के 36 जिलो मेें से 26 जिले की 151 तालुकाओं को महाराष्ट्र सरकार ने सूखा घोषित किया है जबकि हालत अन्य जिलों के भी खराब है। इसी तरह से केरला, कर्नाटक, तमिलनाडू, आंन्ध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड समेत अन्य प्रदेशों के भी कई जिले सूखे से प्रभावित है। भारत के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार आने वाले समय में भारत के लगभग 15 राज्य सूखा ग्रस्त होगे। वर्षा के दिन लगातार घट रहे है, सतही जल के भण्डारों में कमी आ रही है, प्राकृतिक आपदाऐं बढ रही है जलवायु परिवर्तन का भी प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है। कई इलाकों में एक समय मेें अधिक वर्षा हो रही है, जिसके कारण उपजाऊ मिटटी बहकर जा रही है जिससे नदियों में सिल्ट (गाद) बढ रही है। देश की चुनाव सुधार पर कार्य करने वाली महत्वपूर्ण संस्था एडीआर के सर्वे में निकलकर आया है कि भारत मेें जो तीन महत्वपूर्ण समस्याऐं है उनमेें से पेयजल संकट एक प्रमुख समस्या है, आने वाले समय मेें जल संकट सबसे अधिक बढने वाला है। जिस तरह से वन क्षेत्र कम हो रहे है, अवैध खनन के कारण नदी, पहाड, जंगल नष्ट हो रहे है। तापमान मेें बढोत्तरी हो रही है जिसके कारण नई-नई तरह की बिमारियां बढ रही है, कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक अलग-अलग तरह से जल संकट बढता दिखायी दे रहा है पहाडी राज्य भी बेपानी हो रहे है।

राजनीतिक दल सत्ता हथियाने में जुटे हैं। किसी भी राजनैतिक दल ने अपने घोषणा पत्र में पानी, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के वास्तविक मुददो के ऊपर ध्यान नहीं दिया है, सिर्फ मुददो को छूने की कोशिश की है, समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए इच्छा शक्ति का अभाव दिखायी दे रहा है।

सभी दल केवल वोट जुटाने की जुगाड में लगे है, वोट देने वाले भी भ्रमित हो रहे है, राज, समाज को भ्रमित कर रहा है। समाज भी राज को भ्रमित करने में जुटा है। दोनों ही घोषणाओं पर ध्यान नहीं दे रहे है।

विधानसभा चुनाव 2018 किसान कर्ज मुक्ति नहीं बल्कि कर्ज माफी का मुद्दा बना रहा। 2019 का चुनाव भी ऐसा ही हो रहा है। पर्यावरण बिगाड़ने वाले वोट खरीदेंगे, पानी व हवा को दूषित करने वाले वोट खरीदने वालों का सहयोग करेगे। जलवायु परिवर्तन से बेमौसम बरसात होने के कारण मिट्टी कटकर बहती रहेगी। जिसका प्रभाव हमारी धरती पर बाढ़-सुखाड़ लेकर आता रहेगा। बाढ़-अकाल (सूखा) राहत के नाम पर भारत का खजाना खाली होता रहेगा।

सरकारों के चहेते राहतकोष, जलवायु प्रबंधन के नाम पर योजना बनाते रहेगे और अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहेगे। सरकारे ‘नमामि गंगे’ जैसी भ्रष्टाचारयुक्त योजनाएं बनाती रहेंगी। राजनैतिक दलों के घोषणापत्र दिखावा करके वोट लेने वाला भ्रमजाल फैलाते रहेंगे। जो जितना ज्यादा झूठ सफाई से बोलेगा, वही उतनी ही वोटों की कमाई अपने लिए कर लेगा। आज तो भारत में ’सत्यमेव जयते, को झूठमेव जयते’ में बदल दिया है, ऐसा काम राजनेता ही करने में सफल हो रहे है। जिन दलों ने अभी तक अपने घोषणा पत्र जारी किये है, उनके घोषणा पत्र में भी गंगा के वास्तविक मुददो के ऊपर कोई ठोस कार्ययोजना या दृष्टि नहीं दिखायी दे रही है। गंगा के वास्तविक मुददे घोषणा पत्रों से गायब है।

किसी भी राजनैतिक दलों के द्वारा भविष्य रक्षा हेतु पर्यावरण की चिंता दिखायी नहीं दे रही है। भारतीय आस्था, संस्कृति और प्रकृति रक्षा की दुहाई देने वाले दलों ने “गंगा” जो हमारी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, एकता-अखंडता का जाप करने वाले तीन संत, जो कि धर्म व संस्कृति की रक्षा में जुटे थे, एवं गंगा जी की अविरलता हेतु गंगा सत्याग्रह कर रहे थे, उन्हें जान से मरवा दिया है, एक को गुम करवा दिया है, एक आज 167 दिन से आमरण उपवास पर है, उनकी गुहार सुनी नहीं जा रही है। विपक्ष ने भी गंगाजी पर मौन धारण कर रखा है।

पहले कर्जदार बनकर ‘घी पीना’ भारत में अच्छा नहीं मानते थे। आज कर्ज लेकर घी पीने के हम आदी बन रहे हैं। अब इससे मुक्ति का विचार करने वाले दल ही राजकर्ता बन रहे है। भारत का किसान कर्जदार नहीं बने, ऐसी प्रणाली बनाएं, जिससे कर्ज मुक्त तंत्र खड़ा किया जा सके।

राजनैतिक दल लालची सपनों का भारत बनाने में जुटे हैं, परिणाम यह है कि प्रदूषण रात-दिन बढ़ रहा है। हमारे देश की सभी राजधानिया और बडे शहर आधुनिक विकास के माॅडल के कारण विनाश के शिकार हो रहे हैं, देश के प्रमुख शहरो में सांस लेना भी दूभर हो रहा है। वायु प्रदूषण राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ आपातकाल की तरह हो गया है, वायु प्रदूषण की समस्या से तुरन्त निपटने के लिए हमें राष्ट्रस्तर पर नीति बनाने की आवश्यकता है जिसमें ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जाये जो आॅक्सीजन के उत्पादन (वृक्षारोपण) को बढावा दे रहे है। ऐसे लोगों को दण्ड दिया जाए, जो कार्बन को बढाने में सहायक है, क्षेत्रिय उत्सर्जन के मानक निर्धारित किये जाये।

पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सशक्त कानून बनाने की आवश्यकता है जिसकी अनुपालना के लिए स्वतंत्र, सशक्त प्राधिकरण की स्थापना की जाए।

हिमालयी रेंज एवं पश्चिमी घाटो की सम्बद्ध जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए नीति का निर्माण हो, इन इलाकों में रहने वाले लोगों को जोडा जाए, जिससे इनके आजीविका के संसाधनों की रक्षा हो सके।

नदियों में गिरने वाले अपशिष्टों को पूरी तरह से रोका जाए, नदियों के किनारे के क्षेत्रों में सघन वृक्षारोपण एवं तालाब, पोखर, झीलो के पुर्नजीवन एवं नई जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण का कार्य किया जाऐ, मछुवारों समुदाय के आजीविका के अवसरों को संरक्षित किया जाए, नदियों के तट से हो रहे अवैध खनन को रोकने हेतु सख्त कानून बनाये जाऐ, इसके लिए नदी घाटी संगठनों का निर्माण किया जाए।

भारत मंे वन कानून को पुनः परिभाषित करने, स्थानीय समुदायों को वनों तथा वन संसाधनों का संरक्षक बनाया जाए।

भारत मेें तालाबों की समद्ध संस्कृति रही है तालाबों को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र ईकाई का गठन कर अधिकार सम्पन्न बनाया जाए, जो तालाबों के संरक्षण के लिए पूर्ण जबावदेह हो।

राजनैतिक राजधानी अब धुऐ से दूषित हो गई है। आर्थिक राजधानी की पांचों नदियाँ मीठी, दहिसर, पहुंसर और उल्लास बालधूनी सभी शेष नदियां भी नाले बन गई हैं। ज्ञान की राजधानी काशी ने भारत की पहली पहचान गंगा को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है। कहते माई हैं, लेकिन मैला ढोने वाली खच्चर गाड़ी में बदल दिया है। अब हमारी माई को भी राजनेताओं ने कमाई का साधन बना दिया है। पटना, पुणे, मुंबई, चेन्नई सभी बाढ़ की चपेट में चढ़ गये हैं। केदारनाथ में अलकनंदा को कमाई मान लिया है। जम्मू में झेलम ने पहाड़ पर बाढ़ ला कर हमें डरा दिया है।

भारत की मौजूदा राजनीति मेें अपराधियों, बाहुबलियों एवं धनपतियों का बोलवाला बढ रहा है, देश के 85 फीसदी से अधिक जनप्रतिनिधी करोडपति है।

भारत का युवा, बेकारी, बीमारी, लाचारी से ग्रस्त है, रोजगार के अवसर घट रहे है, नौजवान अब खेती जैसे व्यवसाय में जुडना नहीं चाह रहा है, इसके लिए आवश्यक है कि खेती मेें युवाओं को जोडने के प्रयास किये जाए, नये रोजगार के अवसर पैदा किये जाए, जिससे युवाओं पनप रही हताशा, निराशा खत्म हो।

पहले चुनावों में बूथ लूटे जाते थे आज सम्पूर्ण चुनाव घोषणा पत्रों और मीडिया में लोक लुभावने वादेे करके लूटा जा रहा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव मेें गंगा की अविरलता, निर्मलता के लिए खूब वादे किये गये थे, उन वादों के आधार पर अपार जन समर्थन प्राप्त किया और सत्ता में आये और बाद में घोषणा पत्र में किये गये वास्तविक वादे भूल गये। लोकसभा चुनाव 2019 मेे गंगा मां की सेहत केे लिए अब आवश्यक वादे नहीं किये जा रहे है, क्योंकि अब गंगा मां के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते, मतदाता को एक बार ही मूूर्ख बनाया जा सकता है। चुनाव आयोग को घोषणा पत्रों मेें किये गये वादो को वास्तविक रूप से लागू करने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए।

*लेखक जल जन जोडो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं। प्रकाशित लेख उनके निजी विचार हैं।

 

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