क्या भारतीय जनता पार्टी गुजरात में 2014 लोक सभा चुनावों की पुनरावृत्ति कर पाएगी?

दीपक पर्वतियार*

पाकिस्तान में आतंक के ठिकाने पर भारतीय वायु सेना की बमबारी और विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान की पाकिस्तानी कब्जे से सकुशल वापसी से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का कद उनके गृह राज्य गुजरात में काफी बढ़ा है। इसका परिणाम आगामी लोक सभा चुनाव में भी दिखेगा। परन्तु क्या भारतीय जनता पार्टी सभी गुजरात की सभी 26 लोक सभा सीटों पर जीत हासिल कर 2014 लोक सभा चुनावों की पुनरावृत्ति कर पाएगी?

यहां  यह भी जानना ज़रूरी है कि 1999 में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कारगिल युद्ध में भारत की विजय के बावजूद, बीजेपी को गुजरात में 20 ही सीट मिल पाए थे।

राजनितिक विश्लेषकों की माने तो बीजेपी के सभी 26 सीटों में विजय के आसार फिलहाल कम ही हैं। सत्तासीन  भारतीय जनता पार्टी के विरोधी, जो चुनाव में कई वजहों से, जिनका जिक्र नीचे के अनुच्छेदों में किया गया है, अब तक गुजरात के 26 में से 10 सीटों में कांग्रेस की विजय की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें अब लग रहा है कि उनकी संभावित जीत अब सिर्फ तीन या चार सीटों तक सिमट कर रह जाएगी।

यह बता दें कि 2014 में पहली बार बीजेपी ने गुजरात के सभी 26 लोक सभा सीट जीत एक इतिहास रचा था। परन्तु उसके बाद परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है।

भारतीय जनता पार्टी को पूरा विश्वास है कि मोदी के गुजराती होने का इस बार भी उन्हें उनके गृह राज्य में पूरा लाभ मिलेगा। राज्य में बीजेपी की सरकार होने का भी मोदी को फायदा होगा। परन्तु क्या यही वास्तविकता है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी के मुख्य मंत्रित्व काल पश्चात उनके गृह राज्य में बीजेपी की लोकप्रियता घटी है। इसकी अनेक वजह हैं परन्तु एक मुख्य वजह ये भी है कि उनके उत्तराधिकारी उनकी तरह सक्षम नहीं हैं। 2014 के उपरान्त सिर्फ चार वर्षों में ही राज्य में दो मुख्य मंत्री बने। किसानो की समस्या के अलावा एक ख़ास वजह राजनैतिक रूप से शक्तिशाली पटेल वर्ग, जो बीजेपी का ख़ासा समर्थक रहा है, में आरक्षण के मुद्दे को लेकर व्याप्त रोष है। इसी वजह से उन्होंने अपने ही समुदाय की आनंदीबेन पटेल को भी नहीं बख्शा जिस वजह से उन्हें मुख्य मंत्री पद से हटना पड़ा। इसी दरम्यान दलितों का भी बीजेपी के प्रति रोष से बीजेपी की स्थिति और भी कमज़ोर हुई है और कड़वा एवं लेउवा पटेलों के बीच की तनातनी भी बीजेपी के लिए सिर दर्द बना हुआ है।

इन सबका असर 2017 के राज्य विधान सभा चुनावों में देखने को मिला था जब  बीजेपी बस किसी तरह गुजरात में सत्ता में लौट पायी थी। तब उसे 182 – सदस्यीय गुजरात विधान सभा में  सिर्फ 99 सीटें ही मिल पाई थी जो सन 1995 के बाद से, जब बीजेपी राज्य में पहली बार बहुमत से सत्ता में आयी थी, अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा है।

यह भी एक वास्तविकता है कि 2014 के आम चुनावों में पहली बार बीजेपी गुजरात की सभी 26 सीटों पर विजयी हुई थी। क्या मोदी इसे दोहरा पाएंगे? बीजेपी को विश्वास है कि पिछले पांच वर्षों में केंद्र में मोदी सरकार ने किसानों तथा पिछड़े वर्गों के लिए जो काम किया है और जिस प्रकार इस तबके को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का सीधा लाभ मिला है, वह सभी बीजेपी के लिए वोट में तब्दील होगा। इन लाभार्थियों को बीजेपी कमल दीप कार्यक्रम के ज़रिये राज्य भर में इसका अहसास दिलाने का काम युद्ध स्तर पर कर रही है और हर लाभार्थी को बताया जा रहा है कि वे सामूहिक रूप से दीप जलाकर सरकार द्वारा प्राप्त लाभ का सार्वजानिक रूप से उद्गार करें जिससे सभी को यह अहसास हो कि सरकार ने उनके लिए क्या किया है।

दशकों से  गुजरात में हमेशा कांग्रेस और बीजेपी के बीच द्विपक्षीय चुनाव  ही हुए हैं। पिछले विधान सभा चुनाव में शंकरसिंह वाघेला ने कांग्रेस छोड़ अपनी पार्टी बना ली थी। ऐसा माना जा रहा था कि इसका लाभ तब बीजेपी को मिला था। इस साल जनवरी में वाघेला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए हैं। जहां एक ओर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी तालमेल के आसार हैं, क्या यह बीजेपी विरोधी वोटों को बंटने से रोकेगा?

2017 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस की 16 सीटें बढ़ी थी। 2019 में बेहतरी की कांग्रेस की उम्मीद इसी पर और बीजेपी के मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए विधान सभा चुनावों में शिकस्त आधारित है। 2017 में गुजरात में उस वक्त खासकर किसान, आदिवासी तथा पटेल विभिन्न कारणों से बीजेपी से ख़ासा नाराज़ थे।उस वक़्त बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले पटेल नेता हार्दिक पटेल अभी अभी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं? इसका कोई असर कांग्रेस को मिलेगा यह देखने की बात होगी।

इस बार हालांकि आदिवासी और पटेल कौन सा करवट लेंगे यह देखने की बात है, पर जहां तक किसानों का सवाल है केंद्र के अंतरिम बजट में किसानों के लिए की गयी घोषणाओं का एक सकारात्मक प्रभाव भी गुजरात में बीजेपी के प्रति देखने को मिल रहा है।साथ ही पार्टी का मानना है कि गुजरात सरकार का मूंगफली और गेंहू के पोषण मूल्य की घोषणा से किसान खुश  हैं।

गुजरात में आदिवासिओं का सरकार के आदिवासी क्षेत्रों में विभिन्न परियोजनाओं, चाहे वह स्टेचू ऑफ़ यूनिटी हो या सागरमाला परियोजना,  के लिए भूमि अधिग्रहण की पॉलिसी के प्रति नाराज़गी को देख कांग्रेस ख़ास कर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जीत के आसार देख रही थी। हालांकि पाकिस्तान में बमबारी के बाद उसकी उम्मीदों को झटका लगा है पर अभी भी वह  वलसाड और भरुच की आदिवासी सीटों पर शिकंजा कसने की तैयारी में लगी है।

साथ ही साबरकांठा जैसी लोक सभा सीट जो बीजेपी ने 2014 में जीती थी, उसके अंदर पड़ने वाले सात विधान सभा सीटों में से  छह पर कांग्रेस ने 2017 के चुनाव में विजय हासिल की थी। इस वजह से कांग्रेस इस बार साबरकांठा सीट भी जीतने की उम्मीद लगाए बैठी है।

पटेलों के  दो वर्ण —  कड़वा एवं लेउवा — के बीच की तनातनी भी बीजेपी के लिए ख़ासा सर दर्द बनी हुई है।  सौराष्ट्र में पटेल बाहुल्य अमरेली लोक सभा क्षेत्र में  बीजेपी के दो कद्दावर पटेल नेताओं परुषोत्तम सिंह रुपाला और दिलीप संघानी के बीच की तनातनी की वजह से कांग्रेस की विजय के आसार बनते हुए बताये जा रहे हैं। रुपाला कड़वा पटेल हैं जबकि संघानी लेउवा पटेल हैं।

गुजरात में करीब 4 करोड़ 35 लाख मतदाताओं में पटेल मतदाताओं के संख्या 1 करोड़ से ज़्यादा है जो राज्य के कुल  मतदाताओं का 22-23% हिस्सा हुआ। पिछले दो दशक से अधिक समय से समस्त पटेल समुदाय बीजेपी का समर्थक रहा था। परन्तु पटेल आरक्षण की मांग को लेकर 2017 के गुजरात विधान सभा चुनाव में पटेलों का वोट विभाजित हुआ और इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा था। उस वक़्त 10 % आरक्षण की मांग लेकर युवा हार्दिक पटेल ने बीजेपी के खिलाफ पटेलों का एक खेमा खोला था। हार्दिक कड़वा पटेल हैं और पाटीदारों में इनकी आबादी 60% है।  परन्तु साथ ही सत्तारूढ़ गुजरात बीजेपी में भी पटेल नेताओं में कड़वा पटेल नेताओं की संख्या ज़्यादा है। कड़वा पटेल ज्यादातर मेहसाणा, अहमदाबाद, कड़ी-कलोल और विसनगर में हैं, तो वहीं लेउवा पटेल के आबादी सौराष्ट्र-कच्छ इलाके के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर और सुरेंद्र नगर में ज्यादा है।

कड़वा पटेलों की कुलदेवी उमियामाता हैं, जबकि लेउवा पटेल खोड़ियार माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं। पटेल वोटों की अहमियत समझते हुए मोदी इन दोनों पक्षों से लगातार संपर्क में बताये जा रहे हैं। 4 मार्च को जसपुर में विश्व उमियाधाम के भूमिपूजन कार्यक्रम में और उसके अगले दिन लेउवा समाज के अन्नपूर्णा धाम के कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति का पटेलों पर खासा प्रभाव पड़ने की सम्भावना है। ज्यादातर पटेलों का मानना है कि उनका मोदी से कोई व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं है।उनका मानना है कि पटेलों के 10 % आरक्षण की मांग बंधारण  में सुधार कर सरकार यदि चाहे तो यह संभव भी है। हालांकि सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का केंद्र सरकार का निर्णय भी बीजेपी के लिए गुजरात में प्रभावशाली सिद्ध हो सकता है। एक समय पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला के निजी सहायक रह चुके राजनितिक विश्लेषक कपिल व्यास का कहना है कि इस आरक्षण का ज्यादातर लाभ गुजरात में ब्राह्मणों, जिनकी जनसँख्या राज्य में 5 प्रतिशत से ऊपर है, को मिला है और वे काफी खुश हैं।व्यास खुद भी ब्राह्मण हैं ।

कुल मिलाकर देखें, तो ज्यादातर लोगों का मानना है आज गुजरात में विकास कोई मुद्दा नहीं रहा है — “विकास तो दिख रहा है पर आज का मुद्दा यह है कि हम विकसित तो हैं ही, हमारे सीधे मुद्दों की बात करो।”  जो पक्ष इन सीधे मुद्दों पर बात करेगी उसे चुनावी लाभ तो होगा ही। ऐसे में मोदी का पलड़ा ही भारी दिखता है।

 

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