किसान संगठनों ने सरकार से कहा कि कृषि और डेयरी को आर सी ई पी सौदेबाजी से दूर रखे

"आर सी ई पी कृषि आधारित आजीविका और खासकर डेयरी सेक्टर को पूरी तरह बर्बाद कर देगी"

– जागृतबिहार ब्यूरो

नई दिल्ली: कई प्रमुख किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार 31 जुलाई को एक स्वर में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी, आर सी ई पी (Regional Comprehensive Economic Partnership) को नकारते हुए चेतावनी दी कि यह व्यापार समझौता कृषि पर आधारित लोगों की आजीविका, बीजों पर उनके प्रभुत्व को खतरा है और देश के पर्याप्त डेयरी सेक्टर को भी खतरे में डालेगा।

राजधानी दिल्ली में एक प्रेस वार्ता के दौरान, दी इंडियन कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑफ फार्मर्स’ मूवमेंट्स तथा साउथ इंडियन कोऑर्डिनेशन समिति ऑफ़ फार्मर्स मूवमेंट्स के तहत भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक राज्य राइथा संघ, समेत कई बड़े किसान यूनियनों के किसान नेताओं ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार अन्य 16 समझौता करने वाले देशों जैसे कि चीन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने को उत्सुक आसियान देशों के समक्ष घुटने ना टेके जोकि अपने अपने देशों में बड़े कृषि व्यवसाई ओ को लाभ पहुंचाना चाहते हैं।

आर सी ई पी भारत के इस बड़े बाजार में ट्रेड करने वाले भागीदारों के मुनाफे में तो बढ़ोतरी करेगा पर यदि इस समझौते को पूरी तरह लागू किया गया तो देश को 60 हजार करोड़ के राजस्व का नुक़सान होगा – यह बात भारतीय किसान यूनियन के वरिष्ठ नेता युद्धवीर सिंह ने कही।

आर सी ई पी 92 प्रतिशत व्यापारिक वस्तुओं पर शुल्क हटाने के लिए भारत को बाध्य करेगा। भारत 2018-19 में आसियान ब्लॉक, जिसके साथ भारत का मुफ्त व्यापार समझौता है, से सस्ते आयात को मंजूरी देकर 26 हजार करोड़ रुपए पहले ही खो चुका है।

डेयरी हमारे मझौले और छोटे किसानों जिनमें से अधिकतर महिलाएं हैं, को प्रतिदिन नगद धन मुहैया कराती है। भारत पहले से ही डेयरी में आत्म निर्भर देश है। पर आर सी ई पी के जरिए, विदेशी कम्पनियां जैसे कि फोंटरा, दानोन आदि अपने ज्यादा उत्पादों को यहां खपाने की कोशिश करेंगी। हम उन चीजों का आयात क्यों करें जिनकी हमें जरूरत नहीं है। हमारे गरीब किसानों की आजीविका का क्या?

भारत का अधिकांश असंगठित डेयरी सेक्टर वर्तमान में 150 मिलियन लोगों को आजीविका प्रदान करता है। नीति आयोग द्वारा जारी प्रोजेक्शन बताते हैं कि वर्ष 2033 तक भारत की डेयरी सप्लाई 330 मीट्रिक टन तक पहुंच जाएगी जोकि राष्ट्रीय मांग 292 मीट्रिक टन से कहीं ज्यादा है, अतः किसी भी अतिरिक्त आयात की आवश्यकता नहीं है।

न्यूजीलैंड यह आधा सच ही बता रहा है कि उसके केवल 5 प्रतिशत डेयरी उत्पाद ही भारत को निर्यात के लिए रखे गए हैं। लेकिन ये 5 प्रतिशत ही हमारे पूरे बाजार के एक तिहाई के बराबर है। इतना तो हम एक देश का खो देंगे और कल्पना करें कि यदि अन्य देश भी अपना डेयरी उत्पाद यहां झोकेंगे तो क्या परिणाम होगा। यह बात तमिलनाडु के तमिल व्यवसाई गल संगम के मुखिया सेलामैटू ने कही।

आर सी ई पी अन्य व्यापार समझौतों है विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा खतरनाक है। भारत आर सी ई पी के अन्तर्गत व्यापार करने वाली वस्तुओं पर शुल्क को 92% से घटा कर 80% करने के लिए दवाब बना रहा है। पर भारत बाद में ड्यूटी बढ़ा नहीं सकेगा – यह एक ऐसा प्रावधान है जोकि विश्व व्यापार संगठन तक ने नहीं थोपा। इससे भारत को अपने किसानों और उनकी आजीविका के संरक्षण खासी दिक्कत होगी।

डेयरी के अलावा, आर सी ई पी विदेशी कंपनियों को महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे की बीज और पेटेंट में भी छूट देगा। आर सी ई पी को लेकर एक महत्वपूर्ण मुद्दा सदस्य देशों खासकर जापान और दक्षिण कोरिया की इस मांग का है जिसमें वे बीजों, दवाइयों, और कृषि रसायनों पर बौद्धिक सम्पदा संरक्षण लागू करने का है। यह भारतीय किसानों के लिए भयावह होगा क्योंकि भारत पर 1991 में बने इंटरनेशनल यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ न्यू प्लांट वैरायटी कन्वेंशन को लागू करने और इसके मानकों को मानने का दवाब है। यह कन्वेंशन बीजों का पेटेंट करने की एक प्रणाली है जोकि किसानों के अधिकारों को धता बताते हुए कोरपोरेट प्लांट ब्रीडर्स को प्रमुखता देता है और शोध कर्ताओं की शोध और विकास की प्रक्रिया में बाधा खड़ी करता है।

विनिर्माण क्षेत्र भी गंभीर खतरे में है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि कृषि को आर सी ई पी से बाहर नहीं किया गया तो राष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध प्रदर्शन होगा।

यदि जनसंख्या के आधार पर देखा जाए तो आर सी ई पी अब तक का सबसे बड़ा विदेशी व्यापार समझौता होगा जोकि दुनिया की 49% आबादी तक पहुंचेगा और विश्व व्यापार का 40% इसमें शामिल होगा यानी दुनिया की एक तिहाई जी डी पी।

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