क्या अरावली के विनाश पर तुली है हरियाणा सरकार?

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-ज्ञानेंद्र रावत

बीते दिनों देश की शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार की ओर से विधान सभा में पारित अरावली व शिवालिक रेंज में निर्माण कार्य की इजाजत देने सम्बंधी पंजाब भूमि परिरक्षण संशोधन विधेयक-2019 पीएलपीए की कानूनी मान्यता पर रोक लगा दी। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति श्री अरुण मिश्रा व श्री दीपक गुप्ता की पीठ ने हरियाणा सरकार के वकील श्री अनिल ग्रोवर से अरावली-शिवालिक पर्वत श्रृंखला के क्षेत्र में निर्माण कार्य की इजाजत देने से सम्बंधित विधेयक के पारित किये जाने पर नाराजगी जताते हुए कहा कि 60 हजार एकड़ से अधिक वन क्षेत्र में निर्माण की इजाजत देने वाला कानून पारित करना बेहद शर्मनाक है। यह कानून सीधे-सीधे न्यायालय की अवमानना है। पीठ ने श्री ग्रोवर से कहा कि आप क्या समझते हैं कि विधायिका सुप्रीम कोर्ट है। देश में कानून सबसे बड़ा है। इससे उपर कोई भी नहीं है। वनों को नष्ट किये जाने की अनुमति कदापि नहीं दी जा सकती। दरअसल फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में हरियाणा सरकार ने विधान सभा में पंजाब भूमि परिरक्षण संशोधन विधेयक -2019 पारित कर अरावली संरक्षित क्षेत्र में किये गए अवैध निर्माण के बहुत बडे हिस्से को वैध ठहरा दिया था। इसके जरिये सरकार ने इस इलाके में पेड़ काटने, खनन और निर्माण करने का रास्ता साफ कर दिया था। जबकि अभी तक इस पर प्रतिबंध था। असलियत यह है कि इस कानून के जरिये हरियाणा सरकार का अरावली और शिवालिक की पहाड़ियों में वन नियमों को ताक पर रखकर किये गए अवैध निर्माणों को मानयता देने का रास्ता साफ करने का सुनियोजित प्रयास है। कोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ कोई नया कानून लाने की कोशिश न करें। अगर ऐसी हिमाकत करेंगे तो आपके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला चलेगा। गत 8 मार्च को भी सुप्रीम कोंर्ट में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और दीपक गुप्ता की पीठ ने हरियाणा सरकार के सालिसिटर जनरल तुषार मेहता से चेतावनी भरे लहजे मंे कहा कि अगर हरियाणा सरकार ने निर्माण की अनुमति देने के लिए कानून में संशोधन करके अरावली की पहाड़ियां या वन क्षेत्र को कोई नुकसान पहुंचाया तो वह खुद मुसीबत में पड़ जायेगी। कोर्ट की अनुमति के बगैर सरकार इस पर काम नहीं करेगी।

यह परिस्थिति अधिनियम की धारा 2, 3, 4 और 5 में बदलाव के कारण पैदा हुई। यह कानून नवम्बर 1966 से लागू माना जाता। गौरतलब है कि विधान सभा में इस विधेयक के पेश होने पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल ने पुरजोर विरोध किया लेकिन सरकार ने इसके दूरगामी प्रभाव को नजरअंदाज करते और जनभावना की पूरी तरह अनदेखी करते हुए इसे पास कर दिया था। इससे जहां इस इलाके में सरकार से मंजूर प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू होता, वहीं अकेले फरीदाबाद में कांत एन्कलेव को वन आरक्षित क्षेत्र से बाहर कर वैधानिक मान्यता मिल जाती और हुडा के चार सेक्टरों को विकसित किये जाने का रास्ता भी खुल जाता। यही नहीं गुरुग्राम तक में तकरीब 17 हजार एकड़ जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को कानूनी मान्यता भी मिल जाती और इस जमीन पर पेड़ों की कटाई, खनन और निर्माण कार्य भी शुरू हो जाता। इस बाबत राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कहना है कि यह फैसला जनता के हित में लिया गया है। यह समय की मांग है। इसमें निजी क्षेत्रों की जमीन अथवा संस्थानों के बजाय सिर्फ सार्वजनिक संस्थानों सहित मंजूर सरकारी विकास योजनाओं के तहत आरक्षित जमीन और वास्तविक कृषि योग्य जमीन को ही प्रतिबंध से अलग किया जा रहा है। यह तो रही कहने भर की बात जबकि असलियत यह है कि इस संशोधन का असर अरावली और शिवालिक की पहाड़ियों पर पड़ेगा और इससे लगे क्षेत्रों में निर्माण, खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का रास्ता खुल जायेगा। जाहिर है इससे जहां अरावली की हरियाली समूल नष्ट हो जायेगी वही रेगिस्तान की ओर से आने वाली धूल भरी आंधियों से राष्ट्र्ीय राजधानी क्षेत्र को बचाना मुश्किल हो जायेगा। वर्षा चक्र प्रभावित होगा सो अलग। राज्य के भूजल स्रोत भूमाफिया और खनन माफिया के चलते समाप्त प्रायः हैं। अरावली संरक्षित क्षेत्र में भूमाफियाओं द्वारा अवैध तरीके से मानव बस्तियों के विस्तार का दुष्परिणाम वन्यजीवों का भोजन-पानी की खातिर मानव आबादी में प्रवेश के रूप में सामने आया। राज्य में राष्ट्र्ीय राजधानी क्षेत्र के तहत आने वाला फरीदाबाद, बल्लभगढ़, गुरुग्राम वैसे ही डार्क जोन घोषित हो चुका है। यहां भूजल की उपलब्धता का स्तर तकरीब 300 फीट से भी नीचे चला गया है। बोतलबंद पानी के कारोबार की खातिर लगे प्लांटों ने भूजल संकट को और बढ़ाने में अहम भूमिका निबाही है। बड़खल का हश्र सबके सामने है। अरावली विनाश से जल संकट और गहरायेगा, इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। फिर पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और पारिस्थितिकी तंत्र में जो असंतुलन पैदा होगा, उसकी भरपायी कैसे हो पायेगी, इन सवालों का जबाव हरियाणा सरकार के पास नहीं है।

डॉ जगदीश चौधरी

इस बारे में प्रमुख शिक्षाविद, ग्रीन इंडिया फाउण्डेशन के अध्यक्ष और वल्र्ड वाटर काउन्सिल के सदस्य डा. जगदीश चैधरी का कहना है कि हम हरियाणा सरकार के इस पंजाब भूसंरक्षण अधिनियम में संशोधन कर भूमाफियाओं , नेताओं की इस इलाके में कौड़ियों के मोल अवैध रूप से खरीदी गई जमीन को कानूनन वैध किये जाने के कदापि पक्षधर नहीं हैं। इससे अरावली का तो समूल नाश होगा ही, इस इलाके में खनन और निर्माण जो अभी तक अवैध था, वह बात दीगर है कि वह निर्बाध गति से जारी था, को कानूनी मान्यता मिल जायेगी। यह संशोधन मूलतः मनुष्य, जीव-जंतु, पशु-पक्षी और वन्य प्राणियों का विरोधी है। हमें सरकार से वन्य संपदा की रक्षा और उसके उत्तरोत्तर विकास किये जाने की उम्मीद थी लेकिन सरकार इतनी असंवेदनशील भी हो सकती थी इसकी उम्मीद कतई नहीं थी। सरकार का यह कदम हरियाणावासियों के साथ अन्याय है, उनके हितों के उपर कुठाराघात है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस अवैधानिक कदम पर अंकुश लगाकर प्रशंसनीय कार्य किया है। यदि यह कानून अमल में आ जाता और मौजूदा हालात में जल संकट की जो भयावह स्थिति है, उसे देखते हुए तो हरियाणा वासी पानी की एक-एक बूंद को तरस जाते। सामाजिक कार्यकर्ता बाबा रामकेवल की मानें तो सरकार के लिए पचास साल से लटके इस मामले को उठाने की जरूरत ही क्या थी। यदि यह उचित कदम होता तो पूर्ववर्ती सरकारें इसे करने में क्यों हिचकिचाती। यह संशोधन सरकार भूमाफिया और नेताओं के अनैतिक गठजोड़ का जीता-जागता सबूत है। यह सब इनलोगों द्वारा इस इलाके में की जा रही लूट-खसोट को कानूनी जामा पहनाये जाने की साजिश है। यह एनजीटी के आदेशों का खुला उल्लंघन है। हम इसका पुरजोर विरोध करेंगे।

जानकारों की मानें तो राज्य की भाजपा सरकार द्वारा यह विधेयक भूमाफिया और खनन माफिया के दबाव में उनको लाभ पहुंचाने की गरज से लाया गया है। इसके पीछे एक केन्द्रीय मंत्री और एक बाबा की अहम् भूमिका है। इस बात की राज्य की जनता में सर्वत्र चर्चा है कि राज्य सरकार द्वारा यह संशोधन रियल स्टेट डवलपर्स को लाभ पहुंचाने की गरज से किया गया है। जनता में इस बात पर रोष है कि जब यह इलाका तकरीबन आधी सदी से भी ज्यादा समय से इस कानून के तहत संरक्षित था तो एैसी कौन सी आवश्यकता आ पड़ी कि हड़बड़ी में राज्य की भाजपा सरकार को यह संशोधन करने को मजबूर होना पड़ा। जनता का कहना है कि इस विधेयक से इन मंत्री महोदय और भाजपा के चहेते बाबाजी की यहां की जमीनें करोड़ों-अरबों की हो जायेंगीं। वैसे इस विधेयक के खिलाफ राज्य में आक्रोश चरम पर है। पर्यावरणविदों, पर्यावरण विज्ञानियों, पर्यावरण प्रेमियों, समाजसेवी संस्थाओं सहित आम लोग लामबंद हो रहे हैं। लोग जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं, रैलियां निकाल रहे हैं, मानव श्रृंखला बनाकर विरोध दर्ज कर रहे हैं। मुख्यमंत्री का पुतला फूंक रहे हैं। खास बात यह कि विरोध करने वालों में बच्चे, छात्र-छात्राएंे और महिलाएं भी शामिल हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के इस अमानवीय फैसले पर रोक लगाकर सराहनीय कार्य किया है। पैसे के लालच में राज्य की भाजपा सरकार ने पीएलपीए में संशोधन करके इसे बर्बाद करने का फैसला लिया है। यह घोर निंदनीय कृत्य है। सरकार की इस साजिश को हम कामयाब नहीं होने देंगे। क्योंकि इसका असर आम आदमी के जीवन पर पड़ेगा। अरावली हमारी जीवनदायिनी है। जीवन रक्षक है। अरावली है तो कल है। प्रकृति की रक्षा के लिए हम कुछ भी करेंगे। इसको हम किसी भी कीमत पर तबाह नहीं होने देंगे और ऐसी सरकार को सबक सिखाकर ही दम लेंगे।

देखा जाये तो 1988 की वन नीति, 2006 का वन अधिकार अधिनियम और मार्च 2018 में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी वन नीति के मसौदे से यही जाहिर होता है कि मानव के अस्तित्व की रक्षा के लिए वनों का होना बेहद जरूरी है। जलवायु परिवर्तन में कमी लाने की दिशा में वनों की भूमिका अहम् है और वन नीति आने वाली पीढ़ियों के भविष्य, आजीविका, पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा़ के प्रति एक गंभीर दस्तावेज होने का दावा करती दिखाई देती है। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा है। बीते बरसों का जायजा लें तो यह जाहिर होता है कि वन नीति में उल्लेखित उद्देश्य मात्र एक दस्तावेज बनकर रह गए हैं। यह विडम्बना नही ंतो और क्या है कि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते नहीं थकते कि हरित संपदा की कीमत पर विकास नहीं हो। विकास किया जाना चाहिए लेकिन वह पर्यावरण हितैषी सतत विकास हो। पर्यावरण संरक्षण वैश्विक दायित्व है। भौतिक समृद्धि की दौड़ में पर्यावरण से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होना चाहिए। प्रकृति प्रदत्त उपहारों को हम सब बचाने में अपनी उर्जा लगायें। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले विकास के साधनों का विकल्प तलाशा जाना समय की महति आश्यकता है। लगता है हमारी सरकार और उसके कारकुरान अपने प्रधानमंत्री को ही नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं। वह अपने कारनामों से प्रधानमंत्री के कथन को ही बेबुनियाद और झूठा साबित कर रहे हैं। हरियाणा सरकार का यह विधेयक इसका जीता-जागता सबूत है। यह भी कि पर्यावरण संरक्षण सरकार के लिए कोई मुद्दा है ही नहीं। न सरकारें पर्यावरण के मामले पर गंभीर ही हैं। हरियाणा सरकार का यह कदम अरावली के विनाश का ज्वलंत प्रतीक है। उस स्थिति में जब न पहाड़ होंगे, न पेड़-पौधे होंगे, न जंगल होंगे, हरियाली का नामोनिशान नहीं होगा, क्या वर्षा चक्र प्रभावित नहीं होगा। पानी का संकट नहीं गहरायेगा। वन्य प्राणियों का जीवन क्या सुरक्षित रह पायेगा। उस हालत में पर्यावरण रक्षा और पारिस्थितिकी संतुलन की बात बेमानी हो जायेगी।

पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2100 तक समूची हरित संपदा का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। हरित संपदा के खात्मे का सीधा सा अर्थ है धरती की बहुत बड़ी तादाद में जैव संपदा का पूरी तरह खत्म होना जिसकी आने वाले दिनों में भरपायी की उम्मीद बेमानी होगी। दुनिया में जिस तेजी से ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडरा रहा है, उसे मद्देनजर रखते हुए जिन जंगलों से हमें कुछ आशा की किरण दिखाई भी देती है, उनका तो पूरी तरह अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। असल में हरित संपदा के लगातार घटते चले जाने से पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र का संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसी हालत में हरित संपदा के जीवन और पर्यावरण की रक्षा की आशा कैसे की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरियाणा सरकार के इस कानून के अमल पर रोक से आशा की एक किरण जरूर दिखाई देती है। लगता है जन दबाव और कोर्ट की अवमानना के भय के चलते हरियाणा सरकार को यह कानून वापस लेना ही होगा। अन्यथा आगामी चुनाव में खामियाजा उठाने को तैयार रहना होगा।

*लेखक वरिष्ठ पत्रकार , पर्यावरणविद् एवं राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति के अध्यक्ष हैं

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