अपने जमाने से आगे जीने वाला महामानव गांधी

बलिदान दिवस 30 जनवरी पर विशेष

-ज्ञानेन्द्र रावत

बात दिसम्बर 1947 के दूसरे पखवाड़े के शुरूआत की है जबकि देश के विभाजन से उपजे हिंदू-मुस्लिम दंगों खासकर बंगाल में शांति करने के उपरांत गांधी जी दिल्ली आ गए थे। विभाजन से उपजी सांप्रदायिकता से गांधीजी काफी व्यथित थे और उसके परिणाम से वह अंदर से टूट गए थे। वैसे उनकी इच्छा सवासौ साल जीने की थी लेकिन देश के हालात देखकर वह कहने लग गए थे कि अब मैं जीना नहीं चाहता। इसी बीच बिड़ला भवन में जहां वह ठहरे हुए थे, उनके पास भरतपुर और अलवर रियासत से भगाए गए या यूं कहें कि वहां से जान बचाकर आए तथा गुड़गांव के मेवों के प्रतिनिधि मंडल ने आकर उनसे मुलाकात की। उन्होंने उनसे अपना घर-बार सब-कुछ खो चुके हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता के शिकार मेवों से मेवात आकर मिलने और उनकी बदहाली का जायजा लेने की गुजारिश की। गौरतलब है कि इस इलाके में भरतपुर और अलवर रियासत से भाग कर, अपनी जान बचाकर आए हजारों की संख्या में झुंड के झुंड के रूप में भूख-प्यास से बेहाल मेव खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर थे। वे मजबूरी में धीरे-धीरे टुकड़ों में पाकिस्तान जाने वाले थे। जबकि हजारों की तादाद में वे पाकिस्तान जा भी चुके थे। कहते हैं मेवों के इस प्रतिनिधि मंडल को गांधीजी से मिलवाने में मौलाना आजाद की प्रमुख भूमिका थी जो विभाजन की त्रासदी के परिणामों से बहुत दुखी थे। यहां यह जान लेना जरूरी है कि इससे पहले भी मेव गांधी जी से मिलने की एक और कोशिश कर चुके थे। गांधी जी ने मेवों की बदहाली की दर्द-भरी दास्तान सुनी और उन्होंने 19 दिसम्बर को मेवों के बीच जाने का फैसला लिया और पंजाब के मुख्यमंत्री डा. गोपीचंद भार्गव व रणधीर सिंह हुड्डा के साथ वे दिल्ली से तकरीब 65 किलोमीटर दूर मेवात इलाके के घासैड़ा ग्राम पहुंचे।

गांधी जी के आने की खबर सुनकर घासैड़ा में तकरीब एक लाख से ज्यादा मेव इसी आस में इकट्ठे हुए थे कि शायद गांधी जी कोई ऐसा रास्ता निकालें जिससे उन्हें अपना वतन न छोड़ना पड़े। गांधी जी ने वहां मौजूद लुटे-पिटे उनकी ओर टकटकी लगाये मेवों से कहा कि ‘‘आज मेरे कहने में वह शक्ति नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। एक जमाना था जब मेरी हर बात पर अमल किया जाता था। अगर मेरे कहने में पहले की ताकत और प्रभाव होता, तो आज एक भी मुसलमान को भारतीय संघ छोड़कर पाकिस्तान जाने की जरूरत न होती, न किसी हिन्दू या सिख को पाकिस्तान में अपना घर-बार छोड़कर भारतीय संघ में शरण लेने की जरूरत होती। यहाँ जो कुछ हुआ भयानक कत्लेआम, आगजनी, लूट-पाट, औरतों का अपहरण, जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन और इससे भी बदतर जो-कुछ हमने देखा है-वह सब मेरी राय में सरासर बहुत बड़ा जंगलीपन है। ऐसी बर्बरतापूर्ण घटनाओं के किस्से सुनकर मेरा दिल रंज से भर जाता है और सिर शर्म से झुक जाता है। इससे भी अधिक शर्मनाक बात मन्दिरों, मस्जिदों और गुरूद्वारों को तोड़ने और बिगाड़ने की है। अगर इस तरह के पागलपन को रोका नहीं गया तो वह दोनों जातियों का सर्वनाश कर देगा। जब तक देश में इस तरहके पागलपन का राज रहेगा, तब तक हम आजादी से कोसों दूर रहेंगे।

गांधीजी ने आगे पूछा लेकिन इसका इलाज क्या है? संगीनों की ताकत में मेरा विश्वास नहीं है। मैं तो इसके इलाज के रूप में आपको अहिंसा का हथियार ही दे सकता हूँ। वह हर प्रकार के संकट का सामना कर सकता है और अजेय है। हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म आदि सभी धर्मों में अहिंसा की वही सीख भरी है। लेकिन आज धर्म के पुजारियों ने उसे सिर्फ घिसा-पिटा सिद्धान्त-वाक्य बना रखा है, व्यवहार में वे जंगल के कानून को ही मानते हैं। आज मेरी आवाज अरण्य-रोदन जैसी साबित हो, लेकिन मैं तो यही कहूँगा कि जंगली ताकतकी चुनौती का मुकाबला आत्मा की ताकत से ही किया जा सकता है। इसके बाद गांधीजी ने मेवों के प्रतिनिधि द्वारा उन्हें पढ़कर सुनाये गये अभिवेदन का जिक्र किया जिसमें उनकी सारी शिकायतें दी गई थीं और उन्हें दूर करने के लिए कहा गया था। गांधी जी ने कहा कि मैंने वह पत्र आपके मुख्यमन्त्री डाॅ. गोपीचन्द्र के हाथ में दे दिया है। यह तो वे ही खुद बतायेंगे कि पत्र में प्रस्तुत बहुत-सी शिकायतों के बारे में वह क्या करना चाहते हैं। मैं तो सिर्फ यही कह सकता हूँ कि अगर किसी सरकारी अधिकारी ने कोई बुरा काम किया होगा, तो मुझे पूरा भरोसा है कि सरकार उसके खिलाफ उचित कार्रवाई करने में नहीं हिचकिचायेगी। किसी एक आदमी को सरकार की सत्ता हड़पने नहीं दी जा सकती और न वह यह आशा कर सकता है कि उसके कहने से सरकारी अधिकारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदल दिया जाये। मैं यह स्पष्ट रूप से जानता हूँ कि सहमति या राजी-खुशी की दलील पर किसी के धर्म परिवर्तन या किसी स्त्री के दूसरी जाति के पुरूष के साथ विवाह को सही और कानूनी करार नहीं दिया जा सकता। जब चारों ओर आतंक का राज है तो ‘‘अपनी मरजी’’ की बात करना इन शब्दों का दुरूपयोग करना है।

गांधीजी ने आगे बोलते हूए कहा कि अगर मेरे शब्द आपके दुःख में आपको थोड़ा ढाँढस बँधा सकें तो मुझे खुशी होगी। गांधी जी ने उन मेवों का जिन्हें, अलवर और भरतपुर रियासतों से निकाल दिया गया था, जिक्र करते हुए कहा कि मैं उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब सारे बैर भुला दिये जायेंगे और सारी नफरत जमीन के अन्दर दफना दी जायेगी, और जिन्हें अपने घरों से निकाल दिया गया है वे सब अपने घर लौटेंगे और पूर्ण शान्ति एवं सुरक्षा के बीच पहले की तरह अपना कारोबार शुरू करेंगे। तब मेरा दिल खुशी से झूम उठेगा। मैं जब तक जीवित रहूँगा यह आशा नहीं छोडूंगा। मुझे इस बात का भरोसा है कि संघ सरकार इस बारे में अपना कर्तव्य पालन करने में ढिलाई नहीं दिखायेगी और रियासतों को संघ सरकार की सलाह माननी पड़ेगी। भारतीय संघ में शामिल हो जाने से रियासतों के शासकों को अपनी प्रजा को दबाने-कुचलने की आजादी नहीं मिल जाती। अगर राजाओं को अपना दर्जा कायम रखना है तो उन्हें अपनी प्रजा के ट्रस्टी और सेवक बनना होगा। मेव लोग भारतीय संघ की प्रजा हैं। इसलिए उनका यह कत्र्तव्य है कि वह मेवों को शिक्षाकी सुविधा देकर और उनके बसने के लिए बस्तियाँ बनाकर अपने आपको सुधारने में उनकी सहायता करें।’’

उसी दिन गांधी जी ने वापसी में मेवों के खुले शिविरों में जाकर उनसे बातचीत की। इसे गांधी जी की शख्सियत का कमाल कहें या उन पर लोगों का बेहंतहा भरोसा कि उनके घासैड़ा पहुंचने और मेवों से उनकी सीधी बातचीत के बाद यहां के मेवों ने पाकिस्तान जाने का इरादा त्याग दिया। यही नहीं पाकिस्तान जा चुके सैकड़ों मेव परिवार भी वहां से हिन्दुस्तान वापस आ गए। इस असंभव काम को संभव कर दिखाया था साबरमती के संत महामानव गांधी जी ने। ऐसे थे गांधी जी जिनकी घासैड़ा आने के ठीक 40 दिन बाद 30 जनवरी को दिल्ली में एक सिरफिरे ने हत्या हर दी। उनके बारे में अमेरिका के सेनापति मैक आर्थर ने कहा था कि- ‘‘यह एक ऐसा महापुरूष था जो अपने जमाने से भी कहीं आगे जीता था। किसी न किसी दिन दुनिया को उनकी बातें सुननी ही पड़ेंगी, नहीं तो हिंसा के रास्ते दुनिया का विनाश हो जायेगा।’’

*वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

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